आत्मोन्नति की नीव


1-दुख का कारण अज्ञानता है

                   हमारे दुख का कारण
हमारी अज्ञानता है । हमने अपने इस
शरीर को शरीर   मानकर  दुख को  पाल
रखा है,कि मैं शरीर हूं,यह धारणॉ सिर्फ  एक
भ्रम मात्र है । यही भ्रम हमें दुखी यी सुखी करता है ।
तभी तो हम शीत,उष्ण,सुख,दुख आदि का अनुभव करते
हैं । इसलिए हमें इस भ्रम से उबरना होगा। यह प्रमाणित हो
चुका है कि मन की इस विशोष अवस्था में देह का बोध  बिलकुल
नहीं रह जाता है ,उस स्थिति में मनुष्य किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव
नहीं करता,लेकिन मन की यह उवस्था कभी-कभी दिखती है, यब उच्च अवस्था
अनानक एक क्षण में जैसे आंधी की तरह आती है और दूसरे ही क्षण  चली  जाती  है।
इसलिए योग के द्वारा हम इसे प्राप्त कर सकते हैं।और सदैव अपनी आत्मा को शरीर से
पृथक रख कर इस बाहरी दुख की दुनियॉ से हटकर सुख शॉति  की  भीतरी  दुनियॉ, जोकि
आत्मा की असली दुनियॉ है, में रह सकते हैं।

2-आत्मा और प्रकृति का संयोग

              जब हमारी आत्मा प्रकृति (परमात्मा)के
साथ आमेल हो जाती है तो दोनों की शक्तियों का  जो
प्रकाश होता है इससे हमें यह जगत विभिन्न रूपों में दिखाई
देता है । लेकिन अज्ञानता के कारण यह संयोग नहीं हो पाता है ।
क्योंकि हम स्वयं को शरीर मान बैठते हैं,जिससे परमात्मा से संसोग
नहीं हो पाता है।अगर मुक्षे यह ज्ञान हो जाय कि मैं शरीर नहीं हूं बल्कि
मैं सिर्फ आत्मा हूं,जो अजर अमर है,तो मुक्षे ठण्ड गरमी या अन्य किसी बात
का ख्याल नहीं रहता । लेकिन  ऐसा  भी  नहीं कि मेरा  शरीर  मुक्षसे  अलग  है,
क्योंकि जब यह शरीर है तभी मैं भी हूं।लेकिन इस शरीर में मेरा स्तित्व अलग है
,जिसे आत्मा कहते हैं ।और उसी को ” मैं ” कहा गया है,इसीसे यह शरीर कार्य करता
है। यह शरीर तो इस पृथ्वी के जड तत्वों से बना है, जोकि कल नष्ट हो जायेगा, जबकि
आत्मा उस परमात्मा से प्राप्त है,जो नष्ट नहीं होता है । इसलिए अगर मैं (आत्मा) योग
द्वारा इस शरीर से पृथक रूप में अनुभव करूं, तो जब चाहूं अपने जन्मदाता परमात्मा
से मिल सकता हूं । फिर उसके समान प्रकाशमय बन सकता हूं । जब यह ज्ञान हो जाय
कि आत्मा इस पृथ्वी के तत्वों से पूर्णतः स्वतंत्र है तो फिर यह पृथ्वी किसी भी प्रकार
से उसे प्रलोभित नहीं कर सकती है । जो लोग मुक्त हो गये हैं,उनके लिए यह पृथ्वी
उड जाती है ।

3-आत्मा और प्रकृति का स्वरूप

                  अगर देखें तो हर प्रकार के पदार्थ
चाहे क्षुद्र हो या बुद्धि सभी प्रकृति के  अन्तर्गत है
,लेकिन आत्माएं इस प्रकृति से से बाहर  हैं,  इनका
अपना कोई कोई गुण नहीं है । लेकिन फिर भी आत्मा
क्यों सुखी या दुखी होती है ?इसका कारण है -बुद्धि से
प्रतिबिम्बित होकर उसी प्रकार प्रतीयमान होती है जैसे
स्फटिक के टुकडे के पास एक लाल फूल  रखने  पर  वह
स्फटिक लाल दिखाई देता है ,उसी प्रकार हम जो सुख या
दुख अनुभव करते हैं,वह वास्तव में प्रतिबिम्बित मात्र है।
जबकि आत्मा में यह कुछ भी नहीं है । आत्मा तो प्रकृति से
पूर्णतः अलग है ।

4- आने वाले दुख को त्याग दें

                     अगर कर्मों के   सम्बन्ध  में देखें
तो कर्म का कुछ अंश हम पहले  भोग  चुके हैं, और
कुछ अंश वर्तमान में भोग रहे हैं, और  शेष  अंश  भविष्य
में भोगेंगे । हमने जिसका भोग कर लिया है,वह तो अब समाप्त
हो चुका है । जिसका भोग हम वर्तमान में कर रहे हैं, उ सका भोग
तो हमें करना ही होगा । लेकिन जो कर्म भविष्य में फल  देने के  लिए
बचा है,उसी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात उसका नाश कर सकते
हैं । इसके लिए हमें पूरी शक्ति लगानी होगी, जिसने कि अभी तक कोई फल
पैदा नहीं किया है । अपने संस्कारों पर विजय प्राप्त करने के लिए उन्हैं अनेक
कारणों में परिवर्तित करना करना होगा ।

5-विवेक शक्ति की अन्तर्दृष्टि

                           जिनमें विवेकशक्ति है और थोडी
सी भी अन्तर्दृष्टि है तो वे सुख-दुख देने वाली वस्तुओं
के अन्तस्तल को देख लेते हैं, और जान लेते हैं कि ये सुख
और दुख आपस में मानो गुंथे हुये हैं,ये एक दूसरे में परिणित हो
जाते है और इनसे संसार में कोई भी अछूता नहीं रहता है ।ये सबके
पास आते हैं। मनुष्य सारा जीवन मृगजाल के पीछे दौडता रहता है और
कभी भी अपनी वासनाओं को पूर्ण नहीं कर पाता है ।  हमारे  जीवन  में
आश्चर्य की बात तो यह है कि हम प्रतिक्षण प्राणियों को मरते हुये देखते हैं,
लेकिन फिर भी हम सोचते हैं कि हम कभी नहीं मरेंगे । चारों ओर  मूर्खों से
घिरे रहकर हम सोचते हैं कि हम ही एक मात्र पण्डित हैं ।  हम  सोचते हैं  कि
हमारा प्यार ही एकमात्र स्थाई प्यार है । हम यह भी देखते  हैं  कि  दोस्तों  का
प्रेम,सन्तान का प्रेम,यहॉ तक पति-पत्नी का प्रेम भी धीरे-धीरे नष्ट होता जाता
है । लेकिन नष्ट ही इस संसार का धर्म है,यह किसी भी वस्तु से अछूता नहीं रहता
है ।जब मनुष्य संसार की सभी वासनाओं में, यहॉ तक कि प्रेम में भी निराश हो जाता
है,तब क्षणभर के लिए यह भाव उत्पन्न हो जाता है कि यह  संसार भी  कैसा  भ्रम  है,
कैसा स्वप्न के समान है! तभी से एक  किरण  वैराग्य  की  उसके  ह्दय में  फैलती  है,
वह जगदीश सत्ता की एक झलक पाता है । इस संसार के सुख में आसक्त रहते हुये यह
कभी सम्भव नहीं होता । आजतक कोई भी महात्मा न हुआ हो जिसने अपनी महानता को
प्राप्त करने के लिए अपनी इन्द्रिय सुख और भोग को न त्यना पडा हो । दुखः का कारण है
प्रकृति की विभिन्न शक्तियों का आपस में विरोध होना। प्रत्येक अपनी-अपनी ओर खींचते हैं,
और इस प्रकार स्थाई सुख असम्भव हो जाता है।

सहजयोग के आधार भाग-3


1-आदिशक्ति माता की शक्ति

          य़दि आपको आदिशक्ति माता
जी के प्रति विश्वास है तो आपको किसी
भी प्रकार का भय नहीं होना चाहिए।जो भी
कार्य आपके हित में होगा वही माता जी करेंगी ।
जो भी आप कर रहे हैं निडरता पूर्वक करें ,    देवी
की सभी शक्तियॉ आप में अभिव्यक्त होने लगेंगी।
इस प्रकार आप आत्म निर्भर होने लगेंगे और इस
आत्मविश्वास का विकास होना भी आवश्यक है।
जब आप आत्मनिर्भर हो जॉय तो आप न केवल
अपनी सहायता कर सकते हैं बल्कि अन्य लोगों
की भी सहायता कर सकते हैं। मॉ की एक अन्य
शक्ति यह भी है कि वे  आपको  साक्षी  स्थिति
प्रदान कर देती है । आप  सभी  कुछ साक्षी  भाव
से देखते हैं,आपमें अथाह धैर्य आ जाता है,जो भी
होता   है  ठीक  है, क्रोध   नामक  भयानक   अवगुंण
से आपको छुटकारा प्राप्त हो जाता है,आपका व्यक्तित्व
अत्यन्त शॉतिमय हो जाता है  क्योंकि आपकी  मॉ  आपके
साथ होती है,इस दृढ विश्वास के साथ कि मॉ सदा हमारे साथ
हैं,हमारी रक्षा करती हैं ।।

2-निर्विचारिता में ईश्वरीय शक्ति पैदा होती है-

           जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप
परमात्मा की श्रृष्ठि का पूरा  आनंद  लेने लगते  हैं,
बीच में कोई वाधा नहीं रहती है ।विचार आना हमारे
और सृजनकर्ता के बीच  की बाधा  है । हर  काम करते
वक्त आप  निर्विचार हो  सकते  हैं,  और  निर्विचार होते
ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका
सारा आनंद आपको मिलने लगता है ।।

3-चैतन्य लहरियों की नुभूति करें

             अपने शरीर में चैतन्य लहरियों की अनुभूति
करें। यह ह्दय मे प्रकाश की टिमटिमाती लपट है,जो हर
समय जलती रहती है। यह परमात्मा का प्रतिबिम्ब है।जब
कुण्डलिनी उठती है और ब्रह्मरन्द्र को खोलती है तो सदाशिव
के दर्शन होते है,प्रकाश दैदीप्यमान होता है,चैत्य लहरियॉ हमारे
अन्दर से बहने लगती हैं,ये चैतन्य लहरियॉ हमारे शरीर में बहने
वाली सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह होना है ।यह तभी होता है जब कुण्डलिनी
ब्रह्मरन्द्र का भेदन कर ऊपर सदा शिव से मिलन होता है । ये चैतन्य
लहरियॉ हमें पूर्ण सन्तुलन प्रदान करती है,हमारी शारीरिक,मानसिक
एवं भावनात्मक समस्याओं का निवारण करती है। ये हमें परमात्मा से
पूर्ण आध्यात्मिक एकाकारिता का विवेक प्रदान करती है,तथा परमात्मा से
पूर्णतः एकरूप कर देती है ।

4-महानतम् आध्यात्मिक घटना का साक्षी

                      नारगोल का वृक्ष जो आज भी दृढतापूर्वक खडा
है,इसी पेड के नीचे 5 मई1970 को श्री माता जी ने अन्तिम चक्र
खोलने का दिव्य कार्य किया था,यह  जान  पाना  मानव  बुद्धि से परे
है कि स्वर्ग में किस प्रकार चीजैं कार्यान्वित होती हैं।यह हमारा सौभाग्य
और परमात्मा का प्रेम है कि यह आश्चर्यजनक चमत्कार घटित हुआ है।अगर
यह घटना न होती तो आज लोगों को आत्मसाक्षात्कार देने की कोई सम्भावना
न होती । इसमें रूसी सहजयोगियों द्वारा बनाई गई वैबसाइट पर चित्रों द्वारा इस
घटना को दिखाया गया है।

5-कुण्डलिनी ज्योतित रस्सी सम है

                  सहज योग अत्यन्त सूक्ष्म प्रक्रिया है, एस तथ्य
को बहुत थोडे लोग जानते हैं।  कुणडलिनी  छोटे-छोटे तन्तुओं
से बनी ज्योतितसम रस्सी सम है। सुषुम्ना नाडी अत्यन्त पतली
नाडी है,पापों और बुराइयों के कारण इतनी संकीर्ण  हो  जाती है कि
कुण्डलिनी के सूक्ष्म तन्तु ही इसमें से  गुजर सकते हैं  ।यह  अत्यन्त
सुक्ष्म और गहन प्रक्रिया है,मूलाधार से इस पतले  मार्ग में कमसे  कम
एक सूक्ष्म तन्तु गुजर सकता है, उसी एक तन्तु से ये ब्रह्मरन्द्र का भेदन
करती है।आरम्भ में अधिकतर लोगों में यह घटना आसानी से घट जाती
है, प्रकाश में देखने पर उन्हैं लगता है कि ये सब चीजों  उनके  अन्दर निहित
हैं आनंदित हो जाते हैं । लेकिन बोझ के दवाव से पुनः नीचे की ओर खिंच जाती
है,उन्हैं बहुत बडा झटका लगता है तब वे घबराकर संशयालु बन जाते हैं ।

6-आत्म साक्षात्कार के बाद की स्थिति

                  आत्म साक्षात्कार के बाद आप चक्रों की
तरह घूमते हुय़े बहुत से छल्ले देख सकते हैं। आत्मा
सभी तत्वों के कारण-कार्य़ सम्बन्धों से लीला करती है।
छल्लों के रूप में ये हमारे शरीर के पिछले   हिस्से से जुडी
है। सभी चक्रों एवं पावन अस्थि में इसका निवास है।ये सात
छल्ले बनाती है ।आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप चक्रों के
इर्द-गिर्द घूमते हुये और एक छल्ले को  दूसरे  छल्ले  में  जाते
हुये बहुत से छल्लों को देख सकते हैं।कभी-कभीb तो  एक छल्ले
में बहुत से छल्ले और कभी एक छल्ले में चिंगारियों जैसे अर्धविराम
चिन्ह भी आप देख सकते हैं ।ये चेतन्य होता है ।ये मृत आत्मायें होती
हैं ।ये हमारे ऊपर ग्री क्षेत्र में प्रतिविम्बित होती है हाल ही में अमेरिका में
एक कोषाणु के ग्राही का फोटो लिया गया,ये बिल्कुल वैसा ही दिखाई दिया
जैसा आप आत्म साक्षात्कार के बाद देखते हैं । लेकिन व्यक्ति पर कोई अन्य
आत्मा बैठती है तो वह कोषाणु पर प्रतिविम्बित होती है।ये आत्मा किसी भी चक्र
से या सभी चक्रों से जुड सकती है।जुससे व्यक्ति अचेतन हो जाता है और मादकता,
मिर्गी, मस्तिष्क रोग तथा कैंसर आदि रोगों का कारण बनती है।

7-कुण्डलिनी जागरण गणेश के विना सम्भव नहीं है

              क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और
गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के  लिए  वहॉ
होते हैं, इतना ही नहीं,बल्कि कुण्डलिनी के  चक्र  भेदन
करने के बाद श्री गणेश उस चक्र को बन्द कर देते हैं, ताकि
कुण्लिनी फिर नीचे न चली जाय ।गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान
हैं ।बहुत से लोग गलती करते हैं ,क्योंकि त्रिकोणाकार मूलाधार में तो केवल
कुण्डलिनी का निवास है और इससे नीचे मूलाधार चक्र पर श्री गणेश विराजमान
हैं.वे इतने पावन अबोध हैं और कुण्डलिनी श्रीगणेश की कुमारी मॉ हैं ।

8–गलत विचार आने पर गणेश का आह्वान करें

                सहजयोगी हमेशा सोचें और जब-जब
भी गलत विचारों का सामना  करना  पडे,  तो उन्हैं
नियंत्रित करने के लिए गणेश की शक्तियों की याचना
करें प्रार्थना करें क्योंकि उनके कठोर परिश्रम और पावनता
के कारण ही मनुष्य इतनी  महान  ऊंचाइयों  को पार कर पाता
है जोकि व्यक्ति को वास्तव में स्वप्न जैसा दिखाई देता है। प्रारम्भ
में जिन्होंने मूलाधार पर श्री गणेश को देखा है उन्हैं गलतफहमी हुई
है और उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि यही मूलाधार है,  कुण्डलिनी
का निवास। इसी कारण तांत्रिकों ने बहुत सी समस्यायें उत्पन्न कर दी थी ।

9-मूलाधार चक्र सबसे अधिक शक्तिशाली है

                मूलाधार चक्र सबसे अधिक कोमल और
सबसे अधिक शक्तिशाली है इसकी बहुत सी  सतहें हैं
और बहुत से आयाम। यदि मूलाधार ठीक नहीं है  तो आपकी
याददास्त खराब हो जायेगी आपका विवेक गडबड हो  सकता  है।
आपमें दिशा विवेक नहीं रहेगा।अमेरिका में 40 वर्ष से कम उम्र में किसी
प्रकार का पागलपन रोग आ रहा है, इसका  कारण  मूलाधार चक्र  का  खराब
होना है ।बहुत से असाध्य रोग दुर्वल मूलाधार के कारण कारण आते हैं ।90प्रतिशत
मानसिक रोगी दुर्वल मूलाधार के कारण होते हैं।यदि व्यक्ति का मू लाधार शक्तिशाली
है तो उसे किसी भीप्रकार की तखलीफ नहीं होगी ।  आप  मस्तिष्क  को  दोष  देते हैं यह
मस्तिष्क के कारण नहीं बल्कि मूलाधार के कारण होता है। इसलिए मूलाधार के प्रति
विवेकशील रहें ।

10-अहं और क्षं बीज मंत्र है

                           क्षमा प्रार्थना आज्ञाचक्र का मंत्र हैं।हं
और क्षं इसके दो पक्ष हैं ।हं अर्थात ‘मैं हूं’ और     “क्षं‘अर्थात
‘मैं क्षमा करता हूं ‘।अतः जब आज्ञाचक्र पकडता है है तो आपको
कहना पडता है “ मै क्षमा करता हूं“आपके अन्दर यदि प्रति अहं है तो
भी आपको कहना होगा “मैं क्षमा करता हूं” ।यदि हमारे अन्दर प्रति अहं है
तो हमें कहना चाहिए ‘मैं हूं मै हूं’ तो ‘हं’ और ‘क्षं’ बीज मंत्र हैं।ये प्रार्थना के –क्षमा
प्रवचन के बीज हैं।

11-हमें हम (we)कहकर बात करनी चाहिए मैं(I)सम्बोधन से नहीं

             जब किसी चीज से अधिक लगाव होता है
तो मेरा,तेरा शव्द का प्रयोग होने लगता है, मेरा  घर
है मेरा शव्द  को  त्याग  देना  चाहिए, इसके स्थान पर
हम शव्द  का  प्रयोग  करें,  हम  अर्थात  सब एक  हैं, आप
उस  परमात्मा  के  अंग  प्रत्यंग हैं ? क्या  हम हम नहीं  हैं ?
क्या मैं अपनी अंगुली को ह्दय सेअलग कर सकता हूं ?अपना
तो इस पृथ्वी पर कुछ भी नहीं है? ये मेरा बच्चा है,मेरी पत्नी है ?
निसंदेह आपने अपनी पत्नी ,बच्चों की देख-भाल  करनी  है  क्योंकि
यह आपकी जिम्मेदारी है, लेकिन जितना आप अपने बच्चों के लिए करते
हैं उससे अधिक अन्य बच्चों के लिए भी करें ,आपको विश्वास करना होगा कि
आपका परिवार आपके पिता(परमात्मा)का परिवार है और आपकी मॉ (आदिशक्ति)
इसकी देख-भाल कर रही है । यदि आप सोचते हैं कि  आप  अपने  परिवार  की  देख-
भाल स्वयं कर रहे हैं तो-आगे बढकर देखें ?इसलिए अपने परिवार के बारे में अधिक
चिंतित नहों । किसी चीज को अपने तक सीमित न रखें, आप तभी करते हैं जब वह
करवाता है ।डोर तो उसके हाथ में है ।

12- सत्यखण्ड का प्रकाश

             यह वैसे गहन अध्यन का विषय है
कि मस्तिष्क  में जब  कुण्डलिनी  का  प्रकाश
आता है तो मस्तिष्क के माध्यम से सत्य को समझा
जा सकता है। इसी कारण इसे सत्य खण्ड कहा  जाता है,
अर्थात मस्तिष्क द्वारा समझे गये सत्य को आप देखने लगते
हैं।क्योंकि अभीतक मस्तिष्क द्वारा जो कुछ भी आप देख रहे थे
वह सत्य नहीं था,वह सिर्फ वाह्य पक्ष था। अपने मस्तिष्क द्वारा आप
दिव्यता के विषय में कुछ नहीं जान पाते हैं,जब तक कुण्डलिनी इस भाग
में नहीं पहुंच जाती किसी व्यक्ति को दिव्यता के बारे में जान पाना कठिन है,
कोई व्यक्ति सच्चा है या नहीं यह जान पाना कठिन है, जबतक आत्मा का प्रकाश
मस्तिष्क में चमकने न लग जाय।वैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ह्दय में होती है अर्थात
आत्मा का केन्द्र ह्दय में होता है , लेकिन  वास्तव में आत्मा की पीठ ऊपर है,श्री माता
जी अपना दॉयॉ हाथ अपने सिरके ऊ पर  रखकर कहती  हैं  कि  यही  आत्मा है।  जिसे
हम सर्व शक्तिमान परमात्मा कहते हैं,सदा शिव,परवर्दिगार कहते हैं, जिस नाम से भी
भगवान को बुलाया जाता है,बुलाते हैं। जोकि प्रकाश के रूप में चमकने लगता है।

13-हमें स्वप्न कुण्डलिनी से आते हैं

                होता क्या है कि कुण्डलिनी मध्य
भाग में जुडी हुई नहीं है लेकिन इसके अन्दर
बीते हुये समय का पूरा लेखा-जोखा टेप होता है,
जब आप बहुत गहन सुषुप्त अवस्था में चले जाते हैं,
तब नीचे से प्रतीक उभरते हैं और नीली लाइन से होते
हुये आपके मस्तिष्क से गुजरते हैं,जिससे आप स्वप्न देखने
लगते हैं लेकिन सारे स्वप्न विकृत हो जाते हैं।उसमें अजीबोगरीव
प्रतीकात्मकता आ जाती है ।कभी- कभी तो आपके समझ में ही नहीं
आता कि क्या हो रहा है,एक प्रकार की मिली-जुली अभिव्यक्ति बन जाती है।
इसलिए सपनों पर विश्वास न करें ।

14-परमात्मा से कोई लेना देना नहीं है कौन कहता है

                जो लोग यह सोचते हैं कि मैं बेहत्तर
हूं परमात्मा से  मेरा  कोई  लेना- देना  नहीं  है,ऐसे
लोगो को बायें ओर के एकादश की समस्या हो जाती है,
जोकि बहुत खतरनाक होता है इन लोगों को दायें ओर के
ह्दयघात की समस्या हो जाती है। कुण्डलिनी के सहस्रार में
प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है ।यह समस्या
भवसागर से आती है,इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है ,
गलत गुरुओं के पास गये हैं और बाद में सही निष्कर्ष पर न पहुंचने से
सहजयोग के प्रति समर्पित हुये हैं अपनी गलतियॉ स्वीकार कर कहते हैं कि
मैं स्वयं का गुरु हूं तो वे ठीक हो सकते हैंऔर जो लोग कहते हैं मैं सबसे ऊपर
हूं मैं परमात्मा में विश्वास नहीं करता परमात्मा कौन है, उसके अन्दर की समस्या
का निवारण भी हो सकता है कि वह नम्र होकर सहजयोग की परम चेतना में प्रवेश
करने का एक मात्र मार्ग स्वीकार कर लें।

15-शव्द बोलते हैं

                         हर शव्द का अपना महत्व है,और मंत्र
इन्हीं शव्दों  से  बनें  होते  हैं, जैसे  हमारे  शरीर  के  अन्दर
तीन देवियॉ विराजमान हैं महॉ काली, महॉलक्ष्मी, और सरस्वती
तो इन्हैं ऐं,हीं, क्लीं कहते हैं । इसी  प्रकार  ‘री’ र..र..शव्द  शक्ति  का
शव्द है। र जैसे राधा रा अर्थात शक्ति और धा धारण करने वाली जैसे राधा-
राम-और कृष्ण शव्द की उत्पत्ति कृषि शव्द से हुई कृ का   उच्चारण करते ही
विशुद्धि चक्र कार्यान्वित होने लगता है,इसलिए कृष्ण शव्द का उच्चारण करना
चाहिए, क्योंकि कृष्ण शव्द सीधा विशुद्धि चक्र से जुडा है, अतःकृष्ण नाम केवल उसी
का हो सकता है।क्षं शब्द का अर्थ है क्षमा करना। सहजयोग प्रेम का पथ है,प्रेम में अधिक
विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं है।छोटे से शव्द प्रेम को संमझ लेने मात्र से ही व्यक्ति
पंडित हो जाता है।वैसे अधिक पढ-पढकर पंडित भी मूर्ख बन जाता है ।

16-कुण्डलिनी जब उठती है तो स्वर उत्पन्न होते हैं

                   कुण्डलिनी जब उठती है तो स्वर उत्पन्न
करती है, सभी स्वरों के अलग-अलग अर्थ होते हैं ।  और
चक्रो पर जो स्वर सुनाई देते हैं उनका उच्चारण इस प्रकार है-
मूलाधार पर चार पंखुडियॉ हैं-निम्न स्वर हैं-व,श,ष,स-।स्वादिष्ठान
पर छः पंखुडियॉ हैं तो छः स्वर निकलते हैं-ब,भ,म,य,र,ल -मणिपुर पर
दस पंखुडियॉ हैं दस स्वर उत्पन्न होते हैं –ड, ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ-अनाहत
चक्र पर बारह पंखुडियॉ हैं-स्वर –क,ख,ग,घ,ड.च,छ,ज,झ,ञ,ट,ठ –।विशुद्धि चक्र-
सोलह पंखुडियॉ- सोलह स्वर अ,आ, इ,ई,उ, ऊ,श्र,रू, लृ,ए,ऐ,ओ,,अं,अः आज्ञा चक्र
में के स्वर-ह,क्ष -। सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है और कोई
स्वर नहीं निकलता है शुद्ध स्पंदन ह्दय में होता है-लप-टप-लप- टप ।ये सारे स्वर
एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ओं …होता है।सूर्य के सातों
रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें ।

17-ह्दय मस्तिष्क के चंगुल में कैसे फंस जाता है

                   ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से
घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है ।
आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास
करते हैं ।कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आपकी आत्मा
प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने
लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य लहरियॉ आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने
लगती है ,और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।परन्तु अभी भी ह्दय
में पहचान नहीं आई कि  आप  शीतल  लहरियॉ  महशूस  करने  लगते  हैं, आप
उस स्थिति में दूसरों की कुंण्डलिनी उठा सकते हैं,लोगों  को  रोग  मुक्त  कर  सकते
हैं तथा और भी बहुत से कार्य कर सकते हैं ।परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि
पहचान तॉ आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है ।यदि आप हिन्दू हैं तो श्री राम की फोटो
देखते ही आपका ह्दय पहचान लेता हैं।लेकिन एक ऐसे व्यक्ति को पहचानना बहुत कठिन
है जो आपके साथ रह रहा है ।ह्दय की गहनता में जाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? ह्दय
के माध्यम से दिमाग के कार्य को किस प्रकार किया जा सकता है। आपको याद रखना होगा
कि ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है,  ह्दय  जब  रुक  जाता है  तो  मस्तिष्क  भी
रुक जाता है।सारा शरीर बेकार हो जाता है।कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने
लगता है। आपके ह्दय में इसकी रचना करने के लिए आपको क्या अनुभव होना चाहिए ।
ये आपके अपने दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव है।एक बार जब आपमें यह
अनुभव विकसित होने लगता है तब आप जान पाते हैं  कि  आप  दिव्य  व्यक्ति  हैं ।
और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे
जितनी क्षद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है,क्योंकि मुझे पहचानने वाला व्यक्ति
अन्धा व्यक्ति है ।

18-श्री गणेश यदि हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो हनुमान सद्विवेक

              हम जब भी और जहॉ भी विद्युत
चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते  हुये  देखते
हैं तो यह हनुमान के आशीर्वाद से  होता  है ।वे
ही विध्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं ।
अतः हम देख सकते हैं कि श्री  गणेश  जी  के   अन्दर
चुम्बकीय शक्तियॉ हैं वे चुम्बक हैं उनमें चुम्बकीय शक्ति
है पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं ।  मस्तिष्क
के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन  करते  हैं।अतः   गणेश
जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते हैं ।

19-आत्मा जब आपके मस्तिष्क में पहुंचती है तो आप पच्च आयामी हो जाते हैं

             शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं
और आत्मा का निवास  आपके  ह्दय  में  है सदा
शिव का स्थान आपके सिर के    शिखर  पर  है  परन्तु
आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं आपका मस्तिष्क विठ्ठल है
आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का
ज्योतिर्मय होना है।अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके
मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना आत्मा मस्तिष्क में आती
है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं।मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार
करने लगता है।

सहजयोग के आधार-2


1-मन की पवित्रता के लिए कुण्डलिनी जागृत करें-

                    जब भी आप किसी बुरी आदत में फसने
लगते हैं तो आपका अपने पर नियन्त्रण समाप्त होजाता
है ,कोई प्रेतात्मा आप में बैठ जाती है और आप समझ  नहीं
पाते कि उस आदत से कैसे छुटकारा पाया जाय। सहज योग में
जब कुण्डलिनी उठती है तो ये मृत आत्मायें आपको छोड देती हैं और
आप ठीक हो जाते हैं । मैं तुम्हैं यह कहूंगी कि महॉवीर ने केवल नर्क की
बात कही,किजीवन में पाप के दण्डस्वरूप आपको कौन सा नर्क प्राप्त होगा।
अपना हित चाहने वाले मनुष्य के लिए तो नर्क के लिए सोचना कितना भयावह
है ।इसलिए कुण्डलिनी जागृत करके नर्क के रास्ते से मुक्ति प्राप्त करें ।

2-प्रेम से ह्दयचक्र का पोषण होता है–

                   एक सशक्त ह्ददय-चक्र स्वस्थ व्यक्तित्व
का आधार है।प्रेम से पोषण पाकर ह्दयचक्र सुख प्रदान  करता
है।जैसे एक डाक्टर की आत्मीयता और प्रेम उसके इलाज की क्षमता
में वृद्धि करता है । आत्मीय और प्रिय होना भी मर्ज का इलाज है ।  ऐसे
व्यक्तित्व की चैतन्य लहरें दूसरे व्यक्तियों को उसी प्रकार आकर्षित करती है,
जैसे मधुमक्खी फूलों में स्थित मधु की ओर आकर्षित होती है । प्रेम से ही करुणॉ
का जन्म होता है,जिससे हम पिघल जाते हैं ।और विना सोचे-विचारे मानवता की सहायता
के लिए निकल पडते हैं । उस समय नैतिक विवशता या मानसिक निर्णय नहीं अपितु एक सहज
कार्य होता है ।ह्दय दूसरों के दुखों को देखकर पसीज जाता है,क्योंकि वह दूसरों की परछाई है । श्री
माता जी अक्सर कहती हैं कि दूसरा व्यक्ति है ही कौन,जब मन की सीमित क्षमता परमेश्वर को जानने
के लिए असीम हो जाती है ? यदि आप सुर्य और उसका प्रकाश है,यदि आप चन्द्रमा और उसका प्रकाश हैं,
तो फिर एक से दो भेद ही कहॉ ? केवल जहॉ अलगाव है वहॉ अलगाव के कारण लगाव महसूस करते हैं । इसलिए
आप उससे चिपक जाते हैं। जब मन अपने स्तित्व को भूल जाता है,तब वह सीमित मन असीम आत्मा में बदल जाता
है। श्री माता जी के जीवन में तो ऐसी घटनाएं घटती हैं कि दूसरों की पीडा उनके शरीर में महसूस होती है ।और माता जी
का शरीर इतना करुणॉमय है कि वह दूसरों के दुखों को अपने में खीच लेती हैं ।और वीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है ।।

3-मन की सफाई के लिए ध्यान आवश्यक है-

                     यदि मन को साफ करना होता है तो ध्यान करना
आवश्यक है ।जिस प्रकार गन्दे पानी में जब हल चल होती हैतो हम
अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाते हैं, उसी प्रकार मन में भी हल-चल होती
है तो हम अपने स्वरूप को नहीं देख पाते हैं । इसलिए ध्यान करना आवश्यक
होता है। दूसरों की सेवा करें,सेवा से मन शॉत होता है।और जब सेवा करते हो तो
उसके बदले में कुछ भी न लें अन्यथा वह सेवा नहीं बल्कि व्यापार हो जायेगा ।

4-ध्यान में आध्यात्मिकता की शक्ति का केन्द्र बनो-

                   सत्य से सभी कल्याण होते हैं, सत्य कभी पक्षपात
नहीं करता । स्थिरभाव और शान्त चित्त से उसका ध्यान करो,अपने
मन को उसके ऊपर एकाग्र करो,इस आत्मा के साथ अपने को एक भावापत्र
कर डालो।तब शव्दों का कोई प्रयोजन नहीं रहेगा,तुम्हारा मौन ही सत्य का संचार
करेगा । बोलने में शक्ति का ह्रास मत करो ,शान्त होकर ध्यान करो ।वाह्य जगत की
गतिविधिधियों से अपने को विचलित न होने दें । जब तुम्हारा मन सर्वोच्च अवस्था में पहुंचता
है,तब उसकी चेतना तुम्हैं नहीं रहती । शान्त रहकर संचय करो और आध्यात्मिकता के शक्ति
का केन्द्र बन जाओ ।।

5-एकाग्रता से ज्ञान की प्राप्ति-

                        अगर ज्ञान प्राप्त करना है तो एकमात्र उपाय है
एकाग्रशक्ति का प्रयोग करना। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जाकर
अपने मन की समस्त शक्तियों को केन्द्रित कर, वस्तुओं का विश्लेषण
करता है,उनपर प्रयोग करता, और फिर उनका रहस्य जान लेता है। खगोल-
शास्त्री अपने मन की समस्त शक्तियों को एकत्र कर दूरवीन के भीतर से आकाश
में प्रयोग करता है,और फिर सूर्य व तारों के रहस्यों का पता लगता है। हम किसी वस्तु
में मन का जितना निवेश करते हैं उतना ही हम उस विशय में अधिक जान सकते हैं । यदि
प्रकृति के द्वार को खटखटाने और उसपर आघात करने का ज्ञान प्राप्त हो जाय तो प्रकृति अपना
रहस्य स्वतः खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता, एकाग्रता से ही आती है। मानव मन
की शक्ति की कोई सीमा नहीं है,वह जितना एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर
केन्द्रित होती है, यही एक रहस्य है ।

6-योगाभ्यास से विवेकशक्ति में वृद्धि होती है-

                 योगाभ्यास से विवेक शक्ति बढने से हमें शुद्धता प्राप्त
होती है। हमारे आंखों के सामने का आवरण हट जाता है,तब हम जान
लेते हैं कि प्रकृति एक यौगिक पदार्थ है, और उसके सारे दृश्य केवल साक्षी
स्वरूप हैं। फिर हमें इस बात का भी ज्ञान होता है कि प्रकृति ईश्वर नहीं है। इस
प्रकृति के सारे नियम, सारे संयोग ह्दय के राजा आत्मा को दिखाने के लिए हैं ।दीर्घकाल
तक अभ्यास के फलस्वरूप विवेक का जन्म होता है,फलस्वरूप हमारा भय चला जाता है।

7-योगियों का कर्म योग

                 विभिन्न व्यक्तियों में हम जो विभिन्न प्रकार के
मन देखते हैं, उनमें वही मन सबसे ऊंचा होता है,     जिसे समाधि
अवस्था प्राप्त हुई है। औषधि,तपस्या या मंत्रो के वल से शक्ति प्राप्त
कर लेते हैं अनकी वासनाएं तो बनी रहती हैं,पर जो व्यक्ति योग के द्वारा
समाधि प्राप्त कर लेता है,केवल वही वासनाओं से मुक्त होता है। इस प्रकार का
योगी पूर्णता प्राप्त कर लेता है,फिरवासना उनको स्पर्श नहीं कर सकती। वे केवल कर्म
किये जाते हैं,दूसरों के हित के लिए,लेकिन उसके फल की चाह नहीं रखते। लेकिन साधारण
मनुष्यों के लिए जिन्हैं यह अवस्था
प्राप्त नहीं हुई है,उनके कर्म पाप-पुण्य से मिश्रित होते हैं।

8-महॉ शक्ति की अभिव्यक्ति-

                  इस प्रकृति में महॉशक्ति देखी जाती है,लेकिन
स्वप्रकाश नहीं है,वह अपने स्वभाव से चैतन्यरूप नहीं है,    केवल
आत्मा ही स्वप्रकाश है,उसके प्रकाश से ही प्रत्येक वस्तु प्रकाशित होती
है। यदि चित्त का स्वप्रकाश होता तो वह एक साथ ही अपना तथा अपने
विषय का अनुभव कर पाता। लेकिन ऐसा नहीं होता। चित्त जब किसी विषय
वस्तु में तल्लीन रहता है,तो यह अपने सम्बन्ध में कोई भी चिन्तन नहीं कर
सकता। इसलिए मन प्रकाश नहीं है, केवल आत्मा ही स्वप्रकाश है।

9-मॉ होने का मतलब सम्पूर्ण संरक्षण-

                     आप अच्छी तरह से जान लें कि मैं  आपकी  मॉ हूं।
मॉ होने का मतलव होता है कि सम्पूर्ण सिक्योरिटी (संरक्षण)है। मैं
आदि मॉ हूं। आदिशक्ति हूं। मॉ बच्चे को जानती है कि उसमें क्या दोष
है उसे कैसे ठीक किया जा सकता है कभी ढॉटना पडता है,कभी दुलार से
समझाना पडता है ये सिर्फ मॉ का काम है।और कोई कर भी नहीं सकता   है
आप चाहे मुझसे हजारों मील दूर हों, आपके सॉसारिक नाम चाहे मुझे पता नहो
अपने अंग प्रत्यंग के रूप में मैं सबको जानती हूं मैं आप सबके विषय में जानती हूं।
मैने देखा कि जितने भी अवतरण हुये वे बहुत जल्दी चले गये । मगर मॉ की स्थिति
भिन्न है। वह तो अपने बच्चे के लिए लडती रहेगी,संघर्ष करती रहेगी,अंतिम झण तक
संघर्ष करती रहेगी किउसके बच्चे को सभी आशीर्वाद मिल जाये । एक सच्ची मॉ की यही
पहचान है। अपने बच्चे के लिए वहकिसी भी सीमॉ तक जा सकती है ।इस कलयुग में आपकी
सहायता करने तथा प्रेम पूर्वक आपको हर बात बताने के लिए आपकी मॉ अवतरित हुई है ।

10-यह कहना पाप है कि मैं दुर्वल र्हूं –

                    यह न सोचें कि हमारी आत्मा दुर्वल है,ऎसा कहना
ही नास्तिकता है , यदि पाप नाम  की कोई वस्तु है तो यह कहना ही
एकमात्र पाप है  कि  मैं  दुर्वल हूं ।   आप  जो सोचेंगे  वही हो  जाता है , यह
आप अपने को दुर्वलसमझोगे तो आप दुर्वल हो जायेंगे और यदि बलवान समझोगे
तो बलवान बन जाओगे ।

11-सहज योग तथा परमात्मा की खोज-

              हर व्यक्ति के मन में परमात्मा के दर्शन की लालसा
होती है,उसकी जिन्दगी में ऐसा क्षण आता है कि वह अपने अहं और
संस्कारों को भुलाकर अपनी खोज का विश्लेषण करता है,और फिर दोबारा
सत्य की खोज में निकलता है, इसी सत्य का साक्षात्कार तथा अपनी आत्मा
की उपस्थिति की अनुभूति ही सहजयोग का संदेश है ।आत्मा प्रेरित करती है और
सरस्वती की कृपा से शव्द जुडते जाते हैं ।श्री माता निर्मला देवी ही वे मॉ हैं जिन्होंने
इस युग में सत्य को पाने की एक सरल युक्ति सहजयोग का वरदान मानव जाति को दिया
है। परमात्मा द्वारा हमारे शरीर में जिस आत्मा को जन्म दिया है उसका अनुभव करने की शक्ति
हमें जन्म से ही प्राप्त है,लेकिन इसके प्रकटीकरण करने के लिए हमारे भीतर तीव्र इच्छा तथा सही
मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, जब हमारे अन्दर इस शक्ति को जानने तथा पाने की तीव्र इच्छा
होती है,तब श्री माता जी स्वयं मार्ग दर्शन करती हैं और हमें स्वयं ही अपनी आत्मा का अनुभव होने
लगता है्, और सहज स्थिति में उस आत्मा का परमात्मा से योग हो जाता है। वैसे इच्छाओ की तृप्ति
में मनुष्य कभी सन्तुष्ट नहीं होता मगर जब उसे उस परमात्मा का प्रेम और परम चैतन्य की अनुभूति
होती है तो,वह तृप्त हो जाता है।जिसमें सत्य के साथ रहने तथा सत्य के लिए अपने आप से प्रश्न करने
की हिम्मत हो, परमात्मा की कृपा से उसकी इच्छाऐं पूर्ण होती हैं ।

12-सहज योग में ध्यान धारण कैसे क्रियान्वित होता है-

                         सहजयोग-(सह+ज=हमारे साथ जन्मा हुआ)
जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है,
कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे
अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक,
भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी
के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता
को योग कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने  अन्तरनिहित खोज को
आत्म साक्षात्कार(Self Realization) कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद  परिवर्तन  स्वतः
आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो
जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम
होते हैं ।

विद्यार्थियों को ध्यान धारण से लाभ

1-शॉत एवं एकाग्र चित्त –
(Silent and Concentrated Attention) (स्वाधिष्ठा चक्र से)
2-स्मरण शक्ति तथा सृजनशीलता में वृद्धि-
(Increased Memory and Creativity)
(स्वाधिष्ठान तथा मूलाधार चक्र द्वारा )

3-बडों के प्रति आदर तथा सम्मान-
(Respect towards Elders)
(स्वतः जागृति, नाभि चक्र द्वारा)

4-स्व अनुशासन,परिपक्व और
जिम्मेदारी पूर्ण आचरण –
(Self Discipline)
(आज्ञा चक्र द्वारा)

5-आई क्यू के स्तर में वृद्धि-
(Increased IQ, )
(सहस्रार चक्र द्वारा)

6-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोंण-
(Positive Attitude)
( बॉयॉ पक्ष, इडा नाडी)

7-आत्म विश्वास में वृद्धि-
(Self Confidence) (ह्दय चक्र)

शिक्षकों तथा जन सामान्य को लाभः-

1- सबके प्रति प्रेम एवं करुंणॉमय आचरण
(उदार ह्दयचक्र के कारण प्रेम एवं
आनंद का भाव)

2-सहन शीलता और धैर्य में वृद्धि
(प्रकाशित आज्ञाचक्र – क्षमा शक्ति का उदय)

3-अध्यापकों में विद्यार्थियों के उत्थान के लिए
रुचि रखना(सबके प्रति संतुलित एवं समान व्यवहार)

13-कुण्डलिनी शक्ति-

                             हमारे शरीर में  कुण्डलिनी  महॉनतम्  शक्ति है
जिसने कुण्डलिनी का उत्थान कर दिया  उस  साधक  का  शरीर  तेजोमय
हो उठता है।इसके कारण शरीर के दोष एवं अवॉच्छित चर्वी समाप्त हो जाती है।
अचानक साधक का शरीर अत्यन्त संतुलित एवं आकर्षक दिखाई देने लगता है।आंखें
चमकदार और पुतलियॉ तेजोमय दिखाई देती हैं। संत ज्ञानेश्वर जी ने कहा है कि शुषुम्ना
नाडी में उठती हुई कुण्डलिनी द्वारा बाहर छिडका गया जल अमृत का रूप धारण करके उस
प्राणवायु की रक्षा करताहै जो“उठती हैं,अन्दर तथा बाहर शीतलता का अनुभव प्रदान करती है” ।।

14-निर्विचारिता की शक्ति-

                     जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा
की श्रृष्ठि का पूरा आनंद लेने लगते हैं,बीच में कोई वाधा नहीं  रहती  है।
विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है ।हर काम करते वक्त
आप निर्विचार हो सकते हैं, और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका
सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता ङै ।।

15-सहजयोग जीवन का आधार है-

                      जीवन में परिपक्व बनने के लिए उदारता
गुण होना चाहिए। इसके लिए भौतिक चीजों से मोह त्यागना
होगा,उदारता का आनन्द पाने के लिए तो कुछ देना होता है।यदि
एक बार आप उदारता का आनन्द लेने लगेंगे तो आप जान जायेंगे कि
प्रेम और करुणॉ आपसे दूसरों तक बहने लगी है,यह प्रेम और करुणॉ सभी
लोगों तक फैलनी चाहिए। आत्म निरीक्षण करें ,निसंदेह आप उदार बन सकते
हो। उदार विवेक आपमें तभी आयेगा जब आप अपने जीवन का लक्ष्य जान जान
जायेंगे और यह जानेंगे कि आप किसलिए हैं।

17-हमें साक्षी भाव विकसित करना है-

                   साक्षी स्वरूप का मतलव है कि जब आप
चीजों को देखते हैं तो लगता है कि आप नाटक देख रहे हैं और

उस समय आपको लगेगा कि आप नाटक कर रहे हैं।      तो हमें स्वयं
में साक्षी भाव  विकसित  करना है। प्रतिक्रिया   करने  की  आदत  हमें  पड गई
हैऔर ऎसा करना हम अपना अधिकारमान बैठे हैं।आपका यह अधिकार आत्मघातक
है ।प्रतिक्रिया करना गलत है। साक्षी रूप में आप सभी कुछ देखिए । एक बार  जब  आप
साक्षी रूप मे देखने लगेंगेतो आप हैरान होंगे किआप माया का खेल देखने लगे हैंऔर इसमें
अपना स्थान भी आप देख पायेंगे ।वास्तवमें हम प्रतिक्रिया तब करते हैं जब हमारी निर्णय
शक्ति पूर्णतः नष्ट हो जाती है।अपनी इस शक्ति को अन्तर्मुखी बना लीजिए और सेवयं की
आलोचना कीजिए ।आप देखेंगे कि आपका अहंकार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहा है।

18-क्षमा शक्ति विकसित करें-

                         स्वयं में क्षमा शक्ति विकसित करें,आप
में क्षमा शक्ति जितनी अधिक होगी उतने ही आप शक्तिशाली
होंगे। सबको क्षमा कर दें।इस कलियुग में क्षमा के सिवाय और कोई
बडा साधन नहीं है । इसके बिना उन्नति सम्भव नहीं है,यदि कोई गलत
कहे भी तो उसे सद्बुद्धि से जानें,उसको बकवास करने दो।हमारा ख्याल तो इस
तरफ होना चाहिए कि इस गलत बात को सुनकर हमारे अन्दर कोई गलत बात तो
नहीं जा रही है। ईसा मसीह ने भी एक ही चीज बताई थी कि  सबको  क्षमा  कर  दो ।
क्षमा करना जरूरी है। उन्होंने प्रेम पूर्वक उन लोगों के लिए क्षमा की प्रार्थना की थी
जिन्होंने उन्हैं क्रूसारोपित किया था ।इसके लिए एक बहुत बडा मंत्र है-तीन बार कहें-
(क्षम-क्षम-क्षम) ।

19-क्षमा से भार मुक्त हो जाते हैं—

                    क्षमा भूतकाल को भूल जाने से आती है।
जो हो गया जो बीत गया  उसे  भूल  जाओ, वर्तमान  में  तुम
खडे हो।सहजयोग में योग्यता पाने के लिए आपको अपने भूतकाल
से मुक्त होना पडेगा ।अपराध स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है-
क्षमा होनी चाहिए,यदि आपने क्षमा कर दिया तो आप भार मुक्त हो जायेंगे।
और जो क्षमा नहीं कर सकता वह सहजयोगी नहीं हो सकता ।यदि क्षमा करना
नहीं सीखोगे तो क्षमाशील नहीं आयेगी,जिससे एक दिन हमारे अन्दर ज्यादा नष्ट
करने की शक्ति आयेगी और हम ही अपने लोगों को नष्ट
करेंगे ।

20-क्षमा करने से आज्ञा चक्र ठीक हो जाता है

                     आपको यह बात समझनी होगी कि आप अन्य लोगों
से ऊपर उठ चुके हो,क्षमा वही कर सकता है जो बडा होता है,छोटा आदमी
क्या क्षमा करेगा ,बडी तबियत के लोग क्षमा करते हैं,उनकी क्षमाशीलता बहुत
जवर्दस्त होती है।यदि किसी ने गलती कर दी तो उसे माफ कर दीजिए,यदि कल हम
गलती करते हैं तो कौन हमको सजा देगा,किसी की गलती पर हमें तो उसे सजा देने का
अधिकार ही नहीं है,बस आप क्षमा कर दें सबको। आपका आक्षा चक्र ठीक हो जायेगा।

21-अहं (मूर्खतापूर्ण बातें) से मुक्ति पायें-

                    अहं का अर्थ है स्वयं अपने से प्रेम करना
अर्थात झूठी महानता ।छोटी-छोटी बातों के लिए नाराज हो
जाते हैं। आप स्वयं को महान मान बैठते हैं। आपको देखना होगा
कि किस प्रकार उसमें अहं कार्यरत है यही तो पतन का कारण है।इसके
लिए आपको यह करना है कि जब आप स्वयं में अहं देखने लगते हैं तो इस
पर हंसें और सोचें कि मुझमें क्या कमी है ।अहं एक बन्धन नहीं है क्योंकि बन्धन
तो बाहर से आता है जबकि अहं आन्तरिक है, किसी भी चीज से यह आ सकता है।
अहं को ठीक करने के लिए हमें उसका साक्षी होना है कि सिर्फ इस स्थिति को नाटक के
रूप में महशूस करें । साक्षी अवस्था में यह देखना है कि किस प्रकार ये हमें अच्छे मार्ग चलने
से रोकता है ।जब अहं भाव बढने लगे तो स्वयं से कहें कि श्रीमान जी आप यह कार्य नहीं कर रहे
हैं ,ये कार्य आप नहीं कर रहे हैं, यह बात आप स्वयं सुझाते रहेंगे तो आपमें अहं नहीं बैठेगा ।

22-अहंकार एक दीर्घकाय समस्या है-

                    अहंकार जीवन भर चलने वाली समस्या है ।और परमात्मा
ने खासकर मनुष्य को अहंकार का वरदान दिया है,इसलिए ये अहंकार मारने
से नहीं मरता बल्कि सहजयोग में ये तो स्वयं अपने आप छूट जाता है।       इसका
समाधान दूसरों को क्षमा करना है,आपको क्षमा करना सीखना है,प्रातःकाल से संध्या
तक क्षमा प्रार्थी बनें रहें,अपने दोनों कानों को खींचकर कहें कि हे परमात्मा हमें क्षमा करें,
प्रातः काल से सायं-काल तक असका स्मरण करते रहें ।अहं को जीतने के लिए भाषा शैली में
परिवर्तन करना होगा ।

23-कर्म-काण्डों से अहंकार बढता हैं-

                         उपवास रखने, जप,तपकरने,हवन करने आदि से अहंकार
बडता है,क्योंकि अग्नि दायें ओर है।हम जो भी कर्म काण्ड करते हैं उससे अहंकार
बढता है इसका इलाज ईसा मसीह ने बताया कि आप सबसे प्रेम करें, अपने दुश्मनों  से
भी प्रेम करें प्यार के अलावा और कोई इलाज नहीं है-यह परम चैतन्य का प्यार है। यह अहंकार
तो हमारा शत्रु है,जिसका सृजन स्वयं हमने किया है,पहला कार्य जो अहं करता है कि वह दूसरे को
मूर्ख बनाना चाहता है।अनियंत्रित अहंकार परमात्मा को चुनौती देना है।ये अहं उस स्थान पर है जिसे पार
करके आपको सहस्रार में जाना है,आपमें तो एक हजार शक्तियॉ हैं परन्तु अहंकार  के  कारण आप उनका
प्रयोग नहीं कर पाते हैं ।इस अहं में तो कोई विवेक नहीं होता यह तो सिर्फ हमारे मार्ग  की  बाधा है।   माता
जी कहती हैं कि अहं के कारण आप विघटित हो जाते हैं ।आप अकेले पड जायेंगे ।अपने अहं की कार्य शैली
को देखते रहें।अहं से लडाई नहीं करनी है,बल्कि समर्पण करोयहीं एक मात्र उपाय है अहं को दूर करने का ।

24–धर्म तत्व से मनुष्य की पहचान –

                     धर्म ही एक ऎसा तत्व है जो मनुष्य को पशु से अधिक
विलक्षण सिद्ध करता है यदि मनुष्य में ईश्वर और धर्म की भावना न  रहे
तो मनुष्य पशु ही है,वह जडत्व में अपने खाने-पीने तथा शान से  जीने  को  ही
जीवन को मानकर अपना मानव जीवन निरर्थक कर देता है । बस धर्म की भावना ही
उसे जीवन में अपने भगवान के दर्शन की प्रेरणा देकर उनके हित और सेवा में लगने की
ओर प्रवृत्त करती है।

25- सहजयोग कर्मकाण्डों के विरुद्ध है

                     “अहं करोति साहंकारः” अर्थात अगर हम अपने
अहंकार को कम करने की कोशिश करते हैं तो अहंकार बढेगा क्योंकि
हम अहंकार से ही कोशिश करते हैं।जो लोग सोचते हैं कि हम अपने अहंकार
को दबा लेंगे,हर तरह के प्रयोग करते हैं,लेकिन इससे अहंकार नष्ट नहीं  होता  है
बल्कि बढता है क्योंकि अग्नि दायें तरफ है।जो भी कर्मकाण्ड हम करते हैं,उससे अहंकार
बढता है,हवन से भी अहंकार बढता हैक्योंकि अग्नि दायें तरफ है।जो भी कर्मकाण्ड हम करते
हैं उससे अहंकार बढता है,और हम सोचते हैं कि हम ठीक हैं।हजारों वर्षों से कर्म काण्ड होते आये
हैं,लेकिन सहजयोग कर्मकाण्ड का विरोधी है,कर्मकाण्ड की आवश्यकता नहीं है ।

26-आध्यात्मिकता-

                               यदि हम धर्म या सम्प्रदाय के झगडे की बात करते हैं
तो यही प्रकट होता है कि यह आध्यात्मिकता नहीं है।धार्मिक बातें तो हमेशा
धोखली बातों के लिए होती हैं। अगर पवित्रता न हो तो आध्यात्मिकता नष्ट हो
जाती है। फलस्वरूप आत्मा नीरस हो जाती है, जिससे झगडे शुरू होने लगते हैं।
सिद्धान्त,मत,सम्प्रदाय,चर्च,मन्दिर ये तो आध्यात्मिकता की तुलना में नगण्य हैं,
इनकी तो आध्यात्मिकता से तुलना नहीं करनी चाहिए,जिस मनुष्य में आध्यात्मिकता
जितनी अधिक उन्नत होगी, वह व्यक्ति अच्छाई की दृष्टि से उतना ही उधिक ऊंचा होगा।
इसलिए सबसे पहले आध्यात्मिकता अर्जित करना होगा।इसे न भूलें ।धर्म का अर्थ शव्दों,नामों,
सम्प्रदायों से नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक अनुभूति है।

27-आत्म साक्षात्कार का मूल्य समझें-

                         आप एक सहजयोगी हैं तो आपको आत्म
साक्षात्कार का मूल्य मालूम है,आप अपनी रक्षा स्वयं करते हैं।
और आपकी पूरी तरह से रक्षा की जाती है,यह रक्षा आदि शक्ति
करती है। लेकिन विश्व में एक विध्वंसक शक्ति भी कार्यरत है, यह
आसुरी शक्ति नहीं बल्कि शिव की दिव्य विनाशात्मक शक्ति है। जब
कार्य ठीक चलता है तो प्रशन्न होते हैं।परन्तु वे दूर बैठकर हर व्यक्ति
को देख रहे हैं,यदि उन्हैं गडबड लगता है तो वे   नियन्त्रित करते है,  वे
नष्ट करना प्रारम्भ करते है। प्राकृतिक विपत्तियॉ,जैसे भूचाल, भूकम्प,
या तूफान आदि इसमें फिर आपकी कोई मदद नहीं यदि आप आत्म सा-
क्षात्कारी हैं और आप लोगों को आत्म साक्षात्कार दें तो इन्हैं टाला जा
सकता है।

28-शक्ति का अन्तिम निर्णय-

                       अभी तक हम यह नहीं जानते कि
मानव के इतिहास में यह अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा
भयानकसमय है।अन्तिम निर्णय प्रारम्भ हो चुका है।
आज हम अन्तिम निर्णय का सामना कर रहे हैं ।हमें
इस बात का ज्ञान नहीं कि सभी शैतानी शक्तियॉ भेड
की खाल पहने भेडिये आपको भ्रमित करने के लिए अव-
तरित हो गये हैं। आपको चाहिए कि बैठकर सच्चाई को
पहचॉनें।परमात्मा तो करुंणॉमय है,दयालू है,उन्होंने हमें स्वयं
को ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वतंत्रता दी है,परमात्मा ने तो हमें
अमीबा से इस मानव तक विकसित किया है । चारों ओर इतने सुन्दर
विश्व का सृजन किया है। लेकिन उनके निर्णय का हमें सामना करना होगा।
परमात्मा निर्णय वैसा नहीं कि जैसा वह एक नायायाधीश की तरह बैठा हो और
बारी-बारी से आपको बुलाये बल्कि परमात्मा ने आपकेअन्दर निर्णायक शक्तियॉ
स्थापित कर दी हैं। आपका अकलन करने के लिए परमात्मा ने न्यायाधीशों का एक
समूह दण्डाधिकारियों के रूप में आपके अन्दर बैठा दिया है। ये आपके मेरुरज्जु तथा
आपके मस्तिष्क में बनाये गये चक्रों में ये विद्यमान हैं।

सहज योग का आधार-1


1- सहज योग उत्थान के लिए वरदान है

             आप जिस ऊंचाई तक पहुंच रहे हैं
उसका लाभ आपको होना चाहिए।आपको सारे
आशीर्वाद मिल रहे हैं- सौन्दर्य,प्रेम, आनन्द. ज्ञान,
मित्र, तथा सुवुधा। आप चालाकी करते हैं तो आपको
बाहर फेंक दिया जायेगा ।लेकिन आपकी मॉ की करुंणा
इतनी महान है कि वे सदा क्षमा करने और आपको अवसर
प्रदान करने के लिए प्रयत्नशील रहती है ।सारे देवताओं को
जो आप से रूठ गये थे को शॉत करने का प्रयास करती रहती
है, देवता एक सीमा तक मान भी जाते हैं। सहज योग दूसरे
धर्मों की तरह नहीं है जहॉ कि आप गलती करते चले जाते हैं,
मन मर्जी करते हैं, हत्या करते हैंऔर  धोखा  देते हैं  लेकिन
यहॉ तो आपको एक सहजयोगी होना पडेगा ।सहजयोग में
आपको यह जानना होगा कि वास्तव में आपको समर्पित और
ईमानदार होना पडेगा ।

2-अत्यन्त भाउक होना नाडीतंत्र की कमजोरी का फल है- 

                  जब नाडी तंत्र कमजोर होती है तो हम किसी
भी बात पर भाउक हो जाते हैं। इससे हर्ष और विषाद के बीच
एक नाटकीय द्वंद बना रहता है ।इससे वे आलसी, नका-रात्मक,
तामसी,और अपने आप से पीढित रहते हैं।बायें ओर की यह चन्द्रनाडी
मस्तिष्क के दायें भाग पर प्रतिअहंकार के रूप में अधिक दबाव डालती है,
तो मनुष्य पागलपन,पाक्षा-घात तथा वृद्धावस्था को प्राप्त होता है और जो लोग
अत्यधिक भाउक होते हैं वे सन्तुलन खो देते हैं।परिणाम स्वरूप उसका प्रतिअहंकार
दाहिने मस्तिष्क के ऊपर फूल जाता है,और जब यह अधिक बढ जाता है तब बायें ओर
स्थित अहंकार को दबाता है,ताकि सूर्यनाडी को राहत मिले।इस प्रकार वह असंतुलन की स्थिति
में रहता है ।।

3-मन की पवित्रता के लिए कुण्डलिनी जागृत करे

          जब भी आप किसी बुरी  आदत में फसने
लगते हैं तो आपका अपने पर  नियन्त्रण समाप्त
होजाता है ,कोई प्रेतात्मा  आप में बैठ जाती है  और
आप समझ नहीं पाते कि उस आदत से कैसे छुटकारा
पाया जाय। सहज योग में जब कुण्डलिनी उठती है तो ये
मृत आत्मायें आपको छोड देती हैं और आप ठीक हो जाते
हैं । मैं तुम्हैं यह कहूंगी कि महॉवीर ने केवल नर्क की बात
कही,किजीवन में पाप के दण्डस्वरूप आपको कौन सा नर्क
प्राप्त होगा ।अपना हित चाहने वाले मनुष्य के लिए तो नर्क के
लिए सोचना कितना भयावह है ।इसलिए कुण्डलिनी जागृत करके
नर्क के रास्ते से मुक्ति प्राप्त करें ।

4-आदिशक्ति माता जी श्री निर्मला देवी का आध्यात्म-

             अपने जीवन में अपने हिन्दू धर्म के अनुसार
देवी-देवताओं की उपासना में मैं हमेशा भ्रमित रहता था,
ईश्वर को तलासने के लिए कभी इस  मंदिर में  सभी  उस
मंदिर में भटकता रहा,लेकिन कुछ वर्षों पूर्व जब माता जी के
आध्यात्म के सम्पर्क में आया तो ईश्वर के प्रति विचारधारा ही
बदल गई । इस आध्यात्म में सबसे बडी बात  यह  है  कि  हमें
किसी गुरु के शरण में जाने की आवश्यकता नहीं हैं,हम  अपने
गुरु स्वयं अपने आप हैं।जबकि सभी उपदेश  देने  वाले  कहते हैं
कि बिना गुरु के ईश्वर प्राप्त हो ही नहीं सकता । दूसरी बात माता
जी ने कहा कि ईश्वर को रुपये पैसों की भाषा समझ में नहीं आती
है आप इस कार्य में कोई खर्चा न करें ।  तीसरी  बात  माता  जी ने
कहा बाहर जितने भी देवता हैं वे सभी हमारे शरीर में अलग- अलग
तत्वों के रूप में विद्यमान हैं, इसलिए हमें बाहर भटकने की आवश्य-
कता नहीं है,हमें तो इन्हैं अपने शरीर के अन्दर ही प्रशन्न करना है ।
अपने शरीर के अन्दर सात चक्र हैं, कुण्डलिनी मूलाधार में बैठी होती
है, अगर हमारे सातों चक्र  जागृत  अवस्था  में  हैं  तो  कुण्डलिनी  हर
चक्र से होकर अन्त में सहस्रार का भेदन कर सदा शिव में मिल जाती है,
यह परम चैतन्य प्राप्ति की स्थिति है ।  इस  स्थिति  में  शरीर को अथाह
आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है जोकि किसी लक्ष्य की प्राप्ति में सक्षम मानी
जाती है ।इस धरती पर जितनी भी शक्तियॉ या देवता हैं उनमें मॉ का स्थान
प्रथम है,उसी मॉ की आस्था में मैं विश्वास करता हूं ।यहॉ पर जो लिखा गया
है उन्हीं के संरक्षण में लिखा जाता है,यह आपके लिए है।

5–सहज योग में ध्यान धारण कैसे क्रियान्वित होता है?

                    सहजयोग-(सह+ज=हमारे साथ जन्मा हुआ)जिसमें
हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है, कुण्डलिनी
तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्मसे ही
विद्यमान हैं।ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक तथा आध्यात्मक
पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता  होती  है,
सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई
ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को योग कहते हैं । और  कुण्डलिनी  के  सूक्ष्म
जागरण तथा अपने अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार    (Self Realization)
कहते हैं ।आत्म साक्षात्कार के बाद परिवर्तन स्वतः आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा
प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्जस्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,
आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं ।

6–हमारे शरीर में कुण्डलिनी महॉनतम् शक्ति है

                    जिसने कुण्डलिनी का उत्थान कर दिया उस साधक का शरीर
तेजोमय हो उठता है।इसके कारण शरीर के दोष एवं अवॉच्छित चर्वी समाप्त
हो जाती है।अचानक साधक  का  शरीर  अत्यन्त  संतुलित  एवं  आकर्षक दिखाई
देने लगता है।आंखें चमकदार और पुतलियॉ तेजोमय दिखाई देती हैं। संत ज्ञानेश्वर जी
ने कहा है कि सुषुम्ना में उठती हुई कुण्डलिनी द्वारा बाहर छिडका गया जल अमृत का
रूप धारण करके उस प्राणवायु की रक्षा करताहै जो “उठती हैं,अन्दर तथा बाहर शीतलता
का अनुभव प्रदान करती है” ।।

7-निर्विचारिता का आनन्द-

          जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की
श्रृष्ठि का पूरा आनंद लेने लगते हैं,बीच में कोई वाधा नहीं रहती है ।
विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है ।हर काम करते
वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं, और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,
उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता ङै ।

8 -अपनी शक्ति को सन्तुलित करें-

                    कुछ लोग सहज योग के लिए खूब प्रचार करते हैं
लेकिन अपनी ओर ध्यान नहीं देते,वे बाह्य में तो बहुत काम करते
हैं मगर अन्दर की शक्ति की ओर ध्यान नहीं देते, जिससे   उत्थान की
ओर गति प्राप्त नहीं करते।कुछ लोग अन्दर की शक्ति की ओर ध्यान देते हैं
मगर वाह्य की ओर ध्यान नहीं देते,जिससे उनमें संतुलन नहीं आ पाता है वाह्य
शक्ति की ओर बढने पर उनकी अन्दर की शक्ति क्षीण हो जाती है जिससे वे अहंकार
में डूबने लगते हैं। इन लोगों का दूसरों से सम्बन्ध नहीं हो पाता, उनका सम्बन्ध तो इतना
होता है कि किस तरह दूसरों पर रौब झाडें,वे अपने ही महत्व तक सोचते हैं,उनके लिए चैतन्य
कहता है कि अच्छा तुझे जो करना है कर, मिटा ले स्वयं को। वह आपको रोकेगा नहीं । हम तॉ एक
विराट शक्ति हैं, अगर हम चाहते हैं कि कमरे में बैठकर म़ाता की पूजा करें दुनिय़ा से हमारा क्या मतलव
तो वे लोग भी आगे बढ नहीं सकते। यह तो एसा हो गया कि हाथ की एक अंगुली कह रही हो कि मेरा इस
हाथ से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिए हमें आंतरिक और वाह्य दोनों शक्तियों की ओर ध्यान देना होगा

तभी हमारे अन्दर पूरी शक्ति का संतुलन होगा ।

9 -मध्य संतुलन की स्थिति में रहें

        स्वयं पर नियंत्रण रखें कोई अति करने की आवश्यकता नहीं है,
वैसे अति में जाना मानवीय गुंण है।यदि आप तर्कसंगत हैं तो तर्कसंगत
ठहराते चले जाते हैं,मैं एसा नहीं कर सकता,ये ही होता रहा है,मै वैसा नहीं
कर सकता आप इतने भावक हो जाते हैं कि भावनात्मक के नाम पर गलत काम
करने लगते हैं ।स्वयं पर दृष्टि रखें।मध्य में आने की कोशिस करें,जहॉ पर कि आप
पूरी परिधि को देख सकते हैं।यदि आप मध्य से हटकर दायें –बॉयें चले गये तो सारा ही
वैलेंस खत्म हो जायेगा। आदमी सोचता है कि वह राइट साइड है तो थोडा अपने को लेफ्ट
साइड में ले जाना चाहिए,लेफ्ट साइड यानी आप भाउकता में बढ गये तो आपको चाहिए कि
अपने को सन्तुलन में रखें।

10 -परमात्मा की बुद्धि मध्य में है उसी में समाकर रहें

          अति अक्लमंद किसी काम का नहीं है। परमात्मा की बुद्धि
तो बीच में है। उसी में समाकर रहना चाहिए।हम अति पर चले जाते
हैं, और  अपनी  आदतें  नहीं बदलते, हर  बार  हम अति पर चले दजाते
हैं। हमारा स्वयं पर नियंत्रण नहीं है,जिस तरह हमारा मस्तिष्क बताता है
हम वही बात मान लेते हैं,न हमारे अन्दर सन्तुलन है और न हमारी शारीरिक
आवश्यकतायें सन्तुलित हैं,किसी भी प्रकार का सन्तुलन नहीं है,जैसा हम ठीक
समझते हैं बिना सोचे समझे किये चले जाते हैं। यह हमारी विवेकशीलता नहीं है।
सहजयोग में आने से सारे दोष दूर हो जाते हैं। और जब वे दोष समाप्त हो जाते हैं
तो समझ लेना चाहिए कि आपने बडी भारी चीज हासिल कर ली है, जब तक आपके
अन्दर वे दोष होंगे तब तक आप उन्हीं चीजों में लगे रहेंगे दूसरों से झगडा करना, आदि
तो समझलेना चाहिए कि आप मध्य में नहीं हैं।जब आप मध्य में होंगे तो आप किसी एक
चीज से लिप्त नहीं होंगे, आप सब में समाये रहेंगे। आपको  देखना होगा कि आप अहं या
प्रति अहं में तो नहीं हैं यदि प्रति अहं है तो आप बायें  ओर  की  बाधा  से  ग्रस्त   हैं  आलसी
व्यक्ति को चाहिए कि काम की आदत डालें,मस्तिष्क को भविष्य की योजनाओं को बनाने में
लगा दें इस प्रकार बायें ओर से खिंचाव से बचकर धीरे-धीरे स्वयं  को  संतुलित करें। और  यदि
दायें ओर अधिक गतिशील हों तो, तामसिकता द्वारा नहीं बल्कि मध्य का इस्तेमाल करें। बायें ओर
तमोगुंण है और दॉयी ओर रजोगुंण है । हमेशा मध्य में रहें ।संतुलन में रहें।

11 -सत्य की खोज

       प्रचीनकाल में अनेक महान लोग इस पृथ्वी पर सत्य को
बताने के लिए अवतरित हुये और  अपने- अपने  स्तर  से मानव
को समझाने का जी जान से प्रयास करने लगे कि आध्यात्म क्या है,
लेकिन विषमता इतनी  अधिक थी  कि  लोग  इस  बात  को  कभी  नहीं
समझे कि आध्यात्मिकता हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है।हमें परमात्मा
से उनके प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति से एकाकारिता करनी है। उन्होंने अपने प्रयत्न
गलत दिशा की ओर दिये।लेकिन मानव तो बुद्धिमान था  उसने  खोज  प्रारम्भ की,
सत्य की नहीं बल्कि अपनी मुक्ति की,अपनी उन्नति की,इस दिशा की ओर वे भूल
गये कि सर्व प्रथम तो आध्यात्म की खोज करनी चाहिए थी,  क्योंकि आध्यात्म ही
महत्वपूर्ण है। उससमय हमारे सामने दो प्रकार की यात्रायें थी एक तो बायें ओर और
दूसरी दायें ओर से ।सत्य की खोज में लोग जंगलों में  चले  गये  और  संत  बन  गये
लेकिन वे लोग दायीं ओर की तपस्या कर रहे थे अर्थात अपने पंच्चतत्वों पर स्वामित्व
प्राप्त करना ।सभी तत्वों की आन्तरिक चेतना के विषय में वे जानते थे इन्हीं कारणों से
वे इनकी पूजा करने लगे।पर यह तो दांयें ओर की गतितविधि बनगई।अर्थात कर्म काण्ड
में बायी ओर के विना दॉयां पक्ष अत्यन्त भयानक होता है। यदि आप में दॉयॉ पक्ष नहीं है
तो भी तो भी भयानक बात है,लेकिन सर्व प्रथम  आपको  अपने  बॉये  पक्ष  को  विकसित
करना होगा ।करुणॉ,प्रेम,और सबके लिए सौहार्द ही बॉयॉ पक्ष है।बायें ओर बहुत   सी चीजें
हैं देवी आपके अन्दर भिन्न रूपों में विराजमान है,  इसलिए  अपना  बॉयॉ  पक्ष सबसे पहले
मजबूत करें ।जिन लोगों ने दॉयॉ पक्ष अपनाया वे अत्यन्त आक्रामक हो गये और पंच्च तत्वों
के सार का स्वामित्व प्राप्त कर लिया । यह तो ठीक है पर वे लोग क्रोधी स्वभाव के हो गये कि
लोगों को श्राप देने लगे,कठोर वातें वे कहते थे।जो लोग दायें ओर का मार्ग पकडते हैं,परमात्मा के
आशीर्वाद के बिना चलते है,वास्तव में वे राक्षस बन जाते हैं यह मानवता के लिए एक खतरा है।

12-महॉमाया की शक्तियॉ

      सारे संसार में जो चैतन्य बह रहा है वे
उसी महॉमाया(आदिशक्ति)की शक्ति है इस
महॉमाया की शक्ति से  ही  सारे कार्य  होते  हैं,
यह शक्ति  सब  चीजों  सोचती  हैं, देखती  हैं  व
जानती है। तथा सबको पूरी  तरह से ब्यवस्थित
रूप से लाती है, और सबसे बडी  चीज  है  कि यह
आपसे प्रेम करती है, इस  प्रेम  में  कोई  मॉग  नहीं
है,सिर्फ देने की इच्छा है, आपको पनपाने की इच्छा,
आपको बढाने कीइच्छा, आपकी भलाई की इच्छा ।।

13-आदिशक्ति क्या है

          यह शक्ति सर्वशक्तिमान परमात्मा श्री
सदाशिव की शुद्ध इच्छा है,आदिशक्ति परमात्मा
के प्रेम की प्रतिभूति है,परमात्मा का विशुद्ध  प्रेम
है। अपने प्रेम में उनहोंने इच्छा की कि ऐसे मानव
का सृजन हो जो आज्ञाकारी हो,उत्कृष्ट हो,देवदूतों
की तरह हो और इसी विचार से उन्होंने सृजन किया,
ये आदिशक्ति प्रेम की शक्ति है,आदिशक्ति का प्रेम इतना
सूक्ष्म है कि कभी आप इसे समझ  ही  नहीं  सकते  हैं।   सारे
ब्रह्माण्ड का सृजन करने वाली .ही शक्ति है।यह ब्रह्म चैतन्य
है।परम सत्य तो यह है कि सृष्टि ब्रह्म  चैतन्य  के  सहारे  चल
रही है।यह सारा चैतन्य परमात्माकी की ही  इच्छा  है  और  इस
परम चैतन्य की इच्छा से ही आज हम मनुष्य स्थिति में पहुंचे हैं ।।

14-शब्द की शक्ति

     आदिशक्ति माता का नाम लिर्मला है,
जिसमें नि- पहला अक्षर  है,  जिसका अर्थ  है
नहीं।अर्थात कोई वस्तु जिसका कोई अस्तित्व
नहीं है,लेकिन जिसका  अस्तित्व  प्रतीत  होता  है
उसे तो महॉमाया (भ्रम) कहते हैं।सम्पूर्ण विश्व इसी
प्रकार का है ।यह दिखता  तो  है  मगर  वास्तव  में  है
नहीं।यदि हम इसमें तल्लीन हो जाते हैंतो प्रतीत होता
है कि यह सबकुछ है ।तब हमें लगता है कि हमारी आर्थिक
अवस्था अच्छी नहीं है,सामाजिक व पारिवारिक परिस्थितियॉ
असंतोषजन है,हमारे चारों ओर जो कुछ भी है सब खराब है।हम
किसी चीज से संतुष्ट नहीं हैं ।

15-सहजयोगी अपने पैर न छुआने दें

      समान्य व्यक्ति के लिए हर सहजयोगी
गुरु हो सकता है,इस स्थिति में आप किसी से
अपने पैर न छुआने दें,जैसै कि भारत में अपने
से बडों के पैर छूने की  परम्परा  है, उस स्थिति मे
तो कोई बात नहीं है,  मगर  गुरु  के  नाते  यदि  आप
अपने  छूने  देते  हैं  तो  यह  आपके  लिए  हानिकारक
हो सकता है,आप यहजयोग से बाहर चले जाते हैं।  आपको
भी किसी अवतरण के अतिरिक्त किसी अन्य के सम्मुख समर्पित
नहीं होना चाहिए ।अपने गुरु के पैर अवश्य छू लें मगर इससे पहले
आपको चाहिए कि अपने कान पकड लें।

16-चैतन्य लहरियों से स्वयं को सत्यापित करें

यदि आप चैतन्यलहरियों के द्वारा स्वयं
को सत्यापित करते हैं तो वह आपका ज्ञान
बन जाता है,और धीरे-धीरे यही ज्ञान आपको
बताया जाता है।पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में
बताने वाली पुस्तकों में न उलझें, इससे आपका
मस्तिष्क दूसरी दिशा में चला जायेगा।आप ऐसे
ज्ञान की ओर चले जायेंगे जो सम्भवतः ज्ञान है ही
नहीं।फिर आप सोचने लगोगे कि यह  तो  मुझे  पता
ही नहीं था मैं जानता ही नहीं था,आपको तो जानना  यह
है कि आप क्या हैं।आप तो आत्मा हैं और सामर्थ्य के अनुसार
आत्मा का जो प्रकास आप लेकर चल रहे हैं वह साधारण प्रकास
से अलग है,जो प्रकास दिखता है वह न सोचता है न समझता है,और
जो प्रकास आप लेकर चल रहे हैं वह सोचता भी है और समझता भी है,
प्रभु आपको उतना ही प्रकास देता है जितनी आपकी सामर्थ्य है,यह प्रकास
न तो चकाचौध करता है और न ही मध्यम पडता है,एकदम उतना ही जितना
आप समझ सकते हैं।लेकिन यदि आप इन्हैं आप आत्मसात नहीं करते  हैं  तो
आदिशक्ति को बहुत कष्ट होता है इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि इधर- उधर का
ज्ञान महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण तो यह है कि आप कहॉ पहुंचे और सहजयोग
में आपने कितनी परिपक्वता प्राप्त की ।

17-जीवन साथी चयन के लिए ध्यान केन्द्रों को अपवित्र न करें

      हमें उन मर्यादाओं के बारे में बात
करनी है जिनका पालन  सहजयोगी  को
करन हा ।इसके लिए सहजयोगी को आपने
मूलाधार के महत्व  को  समझना  होगा, इसके
विना उत्क्रॉति प्राप्ति नहीं हो सकती है ।सहजयोगी
जीवनसाथी चयन के लिए आश्रमों, ध्यानकेन्द्रों का
उपयोग करते हैं उन्हैं अपवित्र न करें ।इस बात का
सम्मान करें आपको विवाह करना है तो सहजयोगी
से बाहर जीवनसाथी ढूंड सकते हैं,क्योंकि  कई  लोग
सहजयोग से बाहर सम्बन्ध  बनाना  अपनी  शान  के
खिलाफ समझते हैं। कई उदाहरण मिलेंगेकि  लोगों  ने
सहजयोग से बाहर शादी करके अच्छे लोंगों को सहजयोग
में लाये हैं।सहजयोग में तो यह प्रयत्न सम्भव नहीं है,इससे
आपका हित नहीं होगा ,ध्यान रखे यदि आप  ऐसा  करते  हैं
तो आपका मूलाधार कभी भी स्थापित नहीं हॉ पायेगा।आपकी
उन्नति के लिए यब  भयानक  झटका  होगा  एक ही  नगर  में
इसप्रकार का सम्बन्ध बनाना अत्यन्त गलत होगा, इससे गलत
परम्परा बनती हो छेडना,अच्छी जोडी है या तुम अच्छे लगते हो या
इस प्रकार की बातें कहने से मूलाधार  विकृत  होता  है, ब्रह्मचर्य  का
जीवन ही आपके हित में है।किसी भी स्थिति में सहजयोग के नियमों का
पालन किया जाना चाहिए । 

18-बॉईं ओर के लोगों नमक अधिक खाना चाहिए

         दॉईं ओर के लोगों को चीनी का परामर्श दिया
गया है और बॉईं ओर के लोगों को नमक का। नमकसे
वे बहुत सी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं,क्योंकि
नमक उन्हैं व्यक्तित्व प्रदान करता है।,आत्मविश्वास दे सकता
है,जिससे वे गरिमामय ढंग से ,अपनी अभिव्यक्ति कर सकेते हैं।

19-सहस्रार पकडना गम्भीर बात है

               सहजयोगी का अगर सहस्रार पकडता है
तो यह गम्भीर बात है क्योंकि सहस्रार तो आदिशक्ति
का स्थान है,उसे आदिशक्ति को पहचानना होगा,ऐसे लोग
सहजयोग के प्रति द्वंद में रहते हैं।उन्हैं  यह  बात  समझानी
चाहिए कि आपको आत्मसाक्षात्कार माता जी ने दिया है किसी
और ने नहीं। जबतक आप इस बात को नहीं समझते कि राम कृष्ण,
शिव,विष्णु आपसे नाराज हो जायेंगे।

20- नकारात्मकता शक्ति से स्वयं को खतरा है

    आप एक बहुत बडे तपस्वी बन सकते हैं
जो दूसरों को श्राप दे सकें, उन्हैं कष्टों  में  डाल
सकें, और आप यहीं सोचते हैं कि  यह  बहुत  बडी
शक्ति है।बल्कि यह बहुत बडी शक्ति नहीं है, आपकी
अपनी शक्ति ही आपका जीवन ले लेगी।इसलिए आप जब
अपनी कुण्डलिनी उठाते हैं तो आपको भक्ति मार्ग पर चलना
होगा अपने अन्दर अवलोकन करें कि मुझमें क्या कमी है, यह
खोजने का प्रयत्न करें कि आपका क्या आदर्श है। आपको  अपने
बॉये पक्ष पर स्वामित्व पाना होगा। आपमें कुंण्डलिनी जागृत हो गई,
परमात्मा से एकाकारिता हो गई, तब आप दांईं ओर गतिशील हों ।

21- मूलाधार जागृत करें तो पवित्र बन जाओगे

           आपका मूलाधार जागृत होता है तो आप अत्यन्त
पवित्र हो जाते हैं ।आपमें वासना समाप्त हो जाती है,आपका
छिछलापन समाप्त हो जाता है जब तक यह नहीं  होगा  आप
सहजयोग में नहीं रह सकते हो । आप अपने अन्दर पवित्र विवेक
विकसित करें उसका सम्मान  करें  और  उसका  आनंद  लें  और  यह
तभी घटित होगा जब आपका मूलाधार जागृत होगा। क्योंकि बॉयें मूलाधार
में गणेश जी विद्यमान हैं जिससे हम अपने दॉये ओर के दोषों को दूर करते हैं ।

22- स्वादिष्ठान जागृत करें तो यश मिलेगा

       स्वादिष्ठान ऊंचा उठाने के कारण सृजन
करने की क्षमता जाग उठती है ।इतिहास गवाह
है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल से यश  और  धन
कमाने की होड रही है यह शक्ति स्वादिष्ठन  से  ही
प्राप्त होती है ।यहॉ से हमें सभी प्रकार की अटपटी और
गन्दी चीजों का सृजन करने की आक्रामकता पैदा  होती
है। वे लोग जो यश कमाना चाहते हैं या पद  हासिल   करना
चाहते हैं दॉयें स्वादिष्ठान से प्राप्त होते हैं । मध्य स्वाधिष्ठन पर
जब हम होते हैं तो हमारे अन्दर सृजनात्मकता पैदा होती है सुन्दर
गहनता पूर्ण आध्यात्मिक कला का सृजन होता है। लेकिन इस उन्नत्ति
के साथ सभी प्रकार की गन्दगी भी आ जाती है।लेकिन हमें जीवन के उत्थान
की बात सोचकर चलना है ।

23- इतिहास के पन्नों की दृष्टि

    विश्व इतिहास में वक्त ऐसा आया कि
लोग धन कमाने के पीछे पड गये यह  नाभि
चक्र का कमाल है। विश्व में बॉये ओर (भारत क्षेत्र)
के लोग धन कमा रहे थे, जबकि दायें ओर(पश्चिमी देश)
के लोग धन के कारण आक्रामक हो गये थे उन्होंने   सोचा
कि वे विश्व के शिखर पर हैं हम से श्रोष्ठ कोई नहीं हैं।  उनकी
इस सोचने उन्हैं समाप्त कर दिया और उन्हैं उस विन्दु तक ले गई
कि उन्हैं सोचने का मौका मिला कि धन विनाश  के  लिए  नहीं  है।
धन तो निर्माण के लिए होता है, देश का निर्माण  के  लिए,  मानव
शॉति,प्रेम,सहयोग तथा सभी प्रकार के अच्छे गुणों के  निर्माण  के
लिए। ह्दय चक्र में यही लोग मातायें भी  भयानक  थीं  अपने बच्चों
तथा अन्य लोगों पर रौब जमाने का प्रयत्न किया । अपने बच्चों के  लिए
वे कोई बलिदान न कर सकीं, वे अपने बच्चों  व  पति  के  प्रति  आक्रामक थीं
पितृत्व भाव समाप्त हो गया था। विशुद्धि चक्र में इन लोगों ने पूरे विश्व पर अपना
कब्जा करना चाहा, ताकि वे सम्राट  बन  सकें ।  उन्होंने  साम्राज्य  बनाये  और  इस
प्रकार से अमानवीय व्यवहार किये जिसे करना मानव के लिए शर्मनाक है।  वास्तव  में
वे लोग राक्षश थे,ये राक्षशी गुंण आज भी बने हुये हैं। इन लोगों के कारण ही विश्व दो भागों
में बंटा है। कुछ लोग तो आक्रामक हैं और दूसरों को कष्ट देते हैं।परन्तु दूसरे  वे  लोग  भी  हैं
जो सूझ -बूझ वाले हैं उनके द्वारा अच्छी संस्थायें स्थापित की गईं हैं लेकिन लक्ष्य प्राप्ति में वे
अधिक सफल नहीं हो पाये हैं,क्योंकि उनके उच्च पदों के लोग  पूरा  नियंत्रित  कर  रहे  हैं।जबकि

वे स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं उनके आचरण ने इस चक्र के सारे कार्य विगाडदिया है।

24- विश्व शॉति के लिए आध्यात्म को गतिशील होना होगा

       आज पूरे विश्व में अशॉति  का  माहौल
बना हुआ है सर्वत्र युद्ध  चल  रहे  हैं।  मार- काट
और विनाश की स्थिति बनी हुई है। यह क्यों ? लगता
है आध्यात्मिक लोग अत्यन्त मौन हो गये हैं, और वे स्वयं
अपने आध्यात्मिक जीवन का भरपूर आंनंद ले रहे हैं।   विश्व
में आध्यात्मिक लोगों की कमी नहीं है।  बस  उन्हैं  गतिशील   होना
होगा,विश्व शॉति के लिए कुछ न कुछ करना होगा।हम अपनी आध्यात्मिक
उन्नति से सन्तुष्ट हैं,हमें यह देखना होगा कि हमने अन्य लोगों की आध्यात्मिक
उन्नत्ति में कितना योगदान दिया।और वे कहॉ तक पहुंचे हैं। क्या हम उन्हैं परिवर्तित
कर सकते हैं? आपने क्या किया ? आज विश्व में सबसे बडी विपत्ति यही है कि जो लोग
आध्यात्मिक हैं,जिन्होंने कि महान बुलंदियॉ प्राप्त कर ली हैं, उन्हैं तनिक भी चिन्ता नहीं है
कि क्या किया जाना चाहिए ।अपनी आध्यात्मिकता का आनंद लेने के लिए वे पूजाओं में जाते  हैं,
अधिक से अधिक आध्यात्मिकता प्राप्त करते हैं, परन्तु अन्य लोगों को परिवर्तित करने के लिए उन्होंने
कोई सामूहिक कार्य नहीं किया। अपना अन्तर्वलोकन करके देखें और अधिक से अधिक लोगों को सहज योग
में लाने का प्रयास करें

उच्च ज्ञान(सत्य) की खोज


1-चरित्र हमारा आचरण है

                हमारा चरित्र हमारे आचरण का दर्पण है ।
इसलिए चरित्र आचरण का ही नाम है ,क्योंकि हम जैसे
हैं वैसे ही आचरण करते हैं, यही हमारा चरित्र है ।  यदि  हम
अच्छे नहीं हैं तो हम अच्छा आचरण नहीं कर सकते हैं । चरित्रवान
की पहचान है कि क्रोध,हर्ष,लोभ,अहंकार,तथा शत्रुता का अभाव ,सत्य
बोलना,आहार का संयम,दूसरों के दोषों को प्रकट न करना,ईर्ष्या न करना,
अच्छी बातों के लिए दूसरों के साथ सहभागिता करना,शॉति,आत्म संयम,सभी
जीवों के प्रति मैत्री,क्रूरता का अभाव,सरलता,सौम्यता,और सन्तोष ।ये बातें मानव
जीवन की सभी अवस्थाऔं के लिए हर क्षण उपयोगी हैं ।

2- द्वैष-भाव से बचें

               कभी-कभी न चाहते हुये भी हमारे अन्दर
दूसरे के प्रति द्वैष भाव पैदा हो जाते हैं,इससे बचने के लिए
अगर हम इस द्वैष-भाव की तरंग के विपरीत भाव की तरंग को
मन में उठा देते हैं तो द्वैष-भाव की तरंग दब जाती है ।जैसे हमारे
अन्दर क्रोध की एक तरंग उठ जाती है, उस क्रोध को वश में करने के
लिए अगर हम उसके विपरीत भाव की एक तरंग को उठा ठेते हैं तो क्रोध की
तरंग दब जाती है ।अर्थात क्रोध आने पर प्रेम की बात मन में लाते हैं तो क्रोध की
तरंग प्रेम की तरंग से दब जाती है जिससे क्रोध का आवेश कम हो जाता है । जैसे
जब कभी पत्नी अपने पति पर गर्म हो जाती है और उसी समय उसका बच्चा वहॉ
आ जाता है वह उसे उठाकर गोद में लेकर चूम लेती है,यहॉ पर बच्चे के प्रति प्रेम
की तरंग उठ जाती है जो कि पहले की तरंग को दबा देती है । इसी प्रकार जब
कभी चोरी का भाव उठे तो चोरी के विपरीत भाव का चिंतन करना चाहिए ।

3-झूठ के पाप का फल

                     झूठ कहना पाप है,लेकिन उतना ही पाप
तब होता है जब हम दूसरे के झूठ का अनुमोदन  करते  हैं ।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि चाहे तुम पर्वत  की  किसी  भी
कन्दरा में बैठकर कोई पाप-चिन्तन कर रहे हो,किसी के प्रति घृणॉ
का भाव का पोषण कर रहे हो,तो वह चिंतन भी संचित होता रहता है,
और कालॉतर में वह तुम्हारे पास किसी दुख के रूप में आकर तुम पर
प्रवल आघात करेगा ।यदि तुम अपने ह्दय से ईर्ष्या और घृणॉ का भाव
चारों ओर बाहर भेजोगे,तो वह चक्रवृधि व्याज सहित तुम पर    आकर
गिरेगा । दुनियॉ की कोई भी ताकत उसे रोक नहीं सकती है ।  क्योंकि
तुमने एक बार उस शक्ति को बाहर भेज दिया,तो फिर निश्चित रूप से
तुम्हैं उसका प्रतिघात सबन करना ही पडेगा । इसलिए हमें हमेशा इस
बात ध्यान रखना होगा कि कभी भी बुरी बात मन में न आने दें ।

4-एक योगी ब्रह्मचर्यवान होता है

                आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यवान
का होना आवश्यक है । ब्रह्मचर्य के विना आध्यात्मिक शक्ति आ
ही नहीं सकती है । जितने भी महॉन मस्तिष्कशाले पुरुष हुये हैं,वे
ब्रह्मचर्यवान ही थे ।     इससे आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त होती है ।
मानव   समाज  में  जो  भी   आध्यात्मिक   नेतागण   हुये   हैं   वे

ब्रह्मचर्यवान थे ।   ब्रह्मचर्य  से  ही उन्हैं शक्ति प्राप्त हुई है ।

5-सत्य की शक्ति का प्रतिष्ठित होना

                  जब किसी योगी में कर्म फल प्राप्त करने की शक्ति
पैदा हो जाती है तो,अद्भुत चमत्कार दिखने लगता है । यह योगी आप
भी हो सकते हैं । जब सत्य की यह शक्ति आपमें प्रतिष्ठित हो जाती है तो
आप स्वप्न में भी झूठ नहीं कहेंगे ।मन और वचन से सत्य ही बाहर आयेगा,
तब तुम जो भी कहोगे,वही सत्य हो जायेगा । यदि तुम किसी को कृतार्थ होने को
कहो तो- वह उसी क्षण कृतार्थ हो जायेगा । यदि किसी रोगी व्यक्ति से कहोगे कि रोग
मुक्त हो जाओगे तो वह उसी समय स्वस्थ हो जायेगा ।

6-आत्मा में कोई लिंग भेद नहीं होता है

                जो पूर्ण योगी होना चाहते हैं,उन्हैं स्त्री-पुरुष का
भेद भाव छोड देना होता है । क्योंकि आत्मा का कोई लिंग नहीं
होता है-न स्त्री और न पुरुष, तो फिर क्यों वह स्त्री-पुरुष के भेद-भाव
से अपने को कलुषित करें ?क्योंकि उपहार ग्रहण करने वाले मनुष्य के मन
में दाता के मन का असर पडता है,इसलिए ग्रहण करने वाले के भ्रष्ठ हो जाने की
सम्भावना रहती है । दूसरे के पास से कुछ ग्रहण करने से मन की स्वाधीनता चली
जाती है और हम मोल लिए हुए गुलाम के समान दाता के अधीन हो जाते हैं ।इसलिए
किसी प्रकार का उपहार ग्रहण करना भी उचित नहीं है ।

7-उच्च ज्ञान (सत्य)की खोज

              हमारे योगी लोग ज्ञानके सम्बन्ध में कहते हैं कि
ज्ञान एक के बाद एक करके सात स्तरों में आता है । और उनमें
एक अवस्था आती है कि हम निश्चित रूप से जान सकते हैं कि हमें
ज्ञान की प्राप्ति हो रही है । इनमें जब पहली अवस्था प्रारम्भ होती है तो
हमारी ज्ञान पिपासा बनी रहती है,हम इधर-उधर ज्ञान की खोज में लगे रहते
हैं । जहॉ भी कुछ सत्य मिलने की सम्भावना बनी रहती है,झट से वहीं दैड जाते
हैं । यदि वहॉ उसकी प्राप्ति नहीं होती है तो मन अशॉत हो जाता है । फिर अन्य दिशा
में हम सत्य की खेोज में भटकते फिरते हैं । जबतक हम यह अनुभव नहीं कर लेते हैं कि
सत्य. हमारे अन्दर है,जबतक यह दृढ धारणॉ नहीं हो जाती कि कोई भी हमें सत्य की प्राप्ति
करने में सहायता नहीं पहुंचा सकता,इसके लिए हमें स्वयं अपने आप की सहायता करनी होगी ।
फिर हम अपने विवेक का अभ्यास प्रारम्भ करते हैं,तो हम सत्य के नजदीक आने लगते है। फिर
पूर्व का वह असंतोष धीरे-धीरे समाप्त होता जायेगा । फिर यह धारणॉ बन जायेगी कि हमने सत्य
को पा लिया,और यह सत्य के सिवा और कुछ भी नहीं है । हम जान लेते हैं कि सत्य का सूर्य उदित
हो रहा है । हमारे ह्दय में प्रभात की लाली जैसी छाने लगती है ।

1-दसरी अवस्था में हमारे सारे दुख चले जायेंगे। इस जगत का बाहरी
और भीतरी कोई भी विषय हमें दुख नहीं पहुंचा सकेगा ।

2-तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है,हम सर्वज्ञ हो जायेंगे ।

3-चौथी अवस्था में अपने विवेक की सहायता से
सारे कर्तव्यों का अन्त हो जायेगा । फिर चिंताविमुक्ति
की अवस्था आयेगी ।फिर हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी
विघ्न वाधैयें चली गईं है ।

4-पॉचवें अवस्था में मन की चंचलता,संयम,
की असमर्थता आदि सभी नष्ट हो जाएंगे ।

5-छटी अवस्था में हमारा चित्त समझ
लेगा कि इच्छा मात्र से वह अपने कारण में
लीन हो जा रहा है

6-                            अन्तिम सातवें अवस्था में हम देखेंगे कि-मन या
शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, आजतक अज्ञानतावश हमने
अपने आपको उनसे सम्बद्ध रखा था । हम अकेले हैं ।       इस संसार में हम
सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी और सदानन्दस्वरूप हैं । हमारी आत्मा इतनी पवित्र
और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं है । हमें  सुख  की प्राप्ति के
लिए और कुछ भी नहीं करना था ,क्योंकि हम खुद सुख स्वरूप हैं ।हम ज्ञान के लिए
किसी पर निर्भर नहीं हैं, । इस जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमारे ज्ञान लोक से
प्रकाशित न हो । यही एक योगी की अंतिम अवस्था मानी जाती है । फिर योगी धीरे-धीरे
और शॉत हो जाते हैं । वे और कोई कष्ट अनुभव नहीं करते हैं,वे कभी अज्ञान मोह से भ्रमित
नहीं होते ,दुख उन्हैं छू नहीं सकता है वे जान लेते हैं कि मैं न्त्यानन्दस्वरूप और सर्वशक्तिमान हूं ।

आधार


1-       जिस प्रकार पतंगा प्रकाश को
देखकर अपने आप ही अग्नि में गिरता है,
उसी प्रकार भक्त भी भगवान के निमित्त अपना
सर्वस्व त्याग देता है ।

2-                जिस प्रकार दाद को जितना ही अधिक
खुजलाते जाते हैं वह उतना ही अच्छा लगता है, उसी प्रकार
भक्त भी भगवान के नाम लेने और स्तुति करने से तृप्त नहीं होते ।

3-        एक मनुष्य दूसरे को प्यार करता है,परन्तु वह दूसरा उस प्रथम मनुष्य
को प्यार नहीं करता है,इसप्रकार एक ओर के प्रेम को एकॉगी प्रेम, भक्ति कहते हैं ।
जैसे पतंगा तो दीप को चाहता है मगर दीप पतंग को नहीं चाहता है ।

4-              रात्रि के ,समय आकाश में असंख्य तारे दिखते हैं,
लेकिन सूर्योदय होने पर वे दृष्टिगोचर नहीं होते हैं ,क्या इससे कोई
कह सकता है कि आकाश में तारे नहीं हैं ? इसी प्रकार अविद्या रहते यदि
ईश्वर के दर्शन न हों तो क्या कोई कह सकता है कि ईश्वर है ही नहीं ?

5-            जिस प्रकार छत के ऊपर जाने तके लिए सीढी,
बॉस,रस्सी,इत्यादि अनेक साधन हैं, वैसे ही उस ईश्वर के पास
जाने के लिए बहुत से मार्ग हैं,पर प्रत्येक मार्ग अंत में एक होकर ईश्वर
को मिलता है ।

6-          जिस प्रकार अग्नि का कोई रूप नहीं है
परन्तु प्रज्वलित अंगारों से उसका एक प्रकार का रूप
दिखाई देता है, अर्थात उस समय अग्नि रूप धारण कर लेती
है ।उसी प्रकार परमेश्वर का कोई रूप नहीं है,पर वे कभी-कभी विशेष
आकार धारण कर लेते हैं ।

7-                   समुद्र में एक बार डुबकी मारने से यदि
रत्न न मिले तो उस समुद्र को रत्न हीन न कहो।    बार-बार
डुबकी लगाते-लगाते रत्न अवश्य मिलेगा । थोडी सी साधना करके
ईश्वर को न पाकर यह मत बोलो कि ईश्वर नहीं मिला और न ही निराश
होना, धीरज रखकर साधन करते रहें फल मिलने का समय अवश्य आयेगा ।
 8-          जिस प्रकार मेघ से सूर्य ढक जाता है,वैसे ही माया से ईश्वर ढंके हुये हैं । फिर
जैसे मेघ के हटने पर सूर्य दिखाई देता है,वैसे ही माया के हटने पर ईश्वर पर दृष्टि पडेगी ।
 9-      भॉग-भॉग कहकर चिल्लाने से क्या भॉग का नशा चढेगा ? कदापि नहीं । हॉ, यदि भॉग
पीसकर पियो तो नशा होगा । उसी प्रकार खाली ईश्वर -ईश्वर कहकर चिल्लाने से क्या मिलेगा ?
नियम बॉधकर साधन करो तो परमात्मा प्राप्त होगा ।

 

10-                   अमृत के तालाब में चाहे जैसा गिरो,
अमर हो जाओगे,वैसे ही भगवान का नाम चाहे जैसे लो,
उसका फल अवश्य मिलेगा ।

 

11-                  दीपक का कार्य तो प्रकाश देना है ।
अब उसका प्रयोग भात पकाने में करे या जालसाजी के
लिए करें,या गीता को पढने में करे, इससे दीपक का कोई
दोष नहीं है । इसी प्रकार अगर कोई भगवान का नाम को लेकर
मुक्ति चाहता है या चोरी ठगी करता है तो उसमें भगवान का क्या होष है ?

 

12-     प्र-क्या सब मनुष्य ईश्वर दर्शन कर पायेंगे ?
उ-             हॉ जैसा कोई मनुष्य कभी भूखा नहीं रहता है,कोई
नौ बजे,कोई दो बजे और कोई सॉझ को भोजन पाता है,उसी प्रकार
किसी न किसी जन्म में कभी न कभी सभी ईश्वर का दर्शन पायेंगे ।

 

13-           जिस प्रकार मछली चाहे कितनी ही दूर क्यों न
हो पर चारा देखकर वह झट से पास चली आती है, उसी प्रकार
भगवान भी विश्वासी भक्त के मन में शीघ्र आकर उपस्थित होते हैं ।
 14-   जब तक ईश्वर नहीं दिखाई देता है तब तक कामनारूप पवन से
हिलोरे लेती रहती है तबतक ईश्वर नहीं दिखाई देता है, लेकिन जब ईश्वर
की ज्योति झलकती है,तब उसकी झॉकी पाने वाले का ह्दय सुस्थिर हो जाता है ।

 

15-    मन में भगवान के आगमन की पहचान है -जैसे सूर्योदय के पूर्व गगन में ललाई
छा जाती है उसी प्रकार भगवान भी विश्वासी भक्त के मन में शीघ्र आकार उपस्थित होते हैं ।

 

16-           जिस प्रकार दूध में जल डालने पर दूध
और जल दोनों मिलकर एक हो जाते हैं ,लेकिन जब दूध
का मक्खन बन जाता है वह जल में नहीं घुलता है,इसी प्रकार
ईश्वर की प्राप्ति होने पर भक्त जन किसी दशा में भवबन्धन में नहीं पडते ।।

 

17-            सभी जल में नारायण है मगर सब जल
को पिया नहीं जाता । इसी प्रकार नारायण सर्वत्र है,पर हमें
सभी स्थानों पर नहीं जाना चाहिए ।जैसे एक जल से पॉव धोते हैं,
एक से नहाते हैं,एक को पीते हैं और एक को छूते भी नहीं हैं । ऐसे ही
भिन्न-भिन्न प्रकार के स्थान भी हैं । किसी स्थान में हम जा सकते हैं,और
किसी को दूर से ही प्रणॉम करके जाना होता है ।।

 

18-         जैसे कमल के पत्ते जल में लगे रहते हैं
पर जल से अलग रहते हैं और मछली कीचड में रहती है
लेकिन उसकी देह में कीचड नहीं लगता है । इसी प्रकार भक्त
कहीं भी रहे उसकी आस्था उसी ईश्वर में होती है ।

 

19-         पूजा तबतक करनी चाहिए जबतक हरिनाम
में प्रेम के आंसू न बहे । कान में भगवान का नाम सुनते ही
जिसकी आंखों में आंसू निकल आता है,उस मनुष्य को फिर पूजा
करने की आवश्यकता नहीं है ।

 

20-             जो व्यक्ति अपने में ईश्वर को
पहचान सके वह अन्य में भी ईश्वर देख सकता है ।

 

21-           एक के आगे लगातार शून्य लगाते जाने
से संख्या बढती है ,परन्तु एक को मिटा देने से फिर कुछ
भी शेष नहीं रहता है ,उसी प्रकार जब एक ईश्वर है तभी तक
जीवों का स्तिचत्व है ,उस ईश्वर को छोड देने से सर्वस्व मिथ्या
हो जाता है ।

 

22-              अपना दिल सुरक्षित स्थान पर रखो;
वह बहुत कोमल है । घटनाएँ और छोटी छोटी बातें उसपर
बड़ा प्रभाव छोड़ जाती हैं । अपने दिल को सुरक्षित और मन को
स्वस्थ रखने का ईश्वर से श्रेष्ठ स्थान कोई नहीं है ।

 

23-दुनिया के सभी लोग एक ही भाषा में मुस्कुराते हैं ।

 

24–           जब तक तुम असंतुष्टता से कृतज्ञता तक
नहीं जाते, जब तक स्वयं को भाग्यशाली नहीं मानने लगते,
तब तक दुर्भाग्य के बीज उपस्थित रहेंगे । “धन में मेरा भाग्य
ठीक नहीं है| संबंधों में मेरा भाग्य ख़राब है । काम में किस्मत साथ
नहीं देती ।” यह सब अपने मन से निकाल दो ।

 

25-        भगवती देवी जो शुद्ध चेतना हैं,
सभी नामों और रूपों में व्याप्त हैं । उस एक
दिव्यता को पहचानना नवरात्री का अभिप्राय है ।

 

26–             कोई और तुम्हारे लिए फूल लाए,
इसकी प्रतीक्षा न करो । अपना बागीचा खुद लगाओ
और अपनी आत्मा का श्रृंगार करो ।

 

27-     उलझन का अर्थ है कि तुमने एक रास्ता
चुना पर दूसरे रास्ते पर अधिक आनंद दीखता है ।
तुम कोई भी चुनो, लगता है दूसरा अधिक आनंदमय
होगा । आनंद किसी और से अधिक नहीं होगा । तुम स्वयं
ही आनंद के स्रोत हो ।

 

28-        शांति तुम्हारा स्वभाव है, फिर भी तुम अशांत हो।
मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम बंधन में हो ।      प्रसन्नता
तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम किसी न किसी कारण दुखी हो जाते हो।
संतोष तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम कामनाओं से घिरे हो । उपकार तुम्हारा
स्वभाव है फिर भी तुम दूसरों के प्रति कदम नहीं बढ़ाते ।

 

29-               साधना का अर्थ है अपने
स्वभाव की ओर जाना, अपने स्वरूप में आना ।

 

30-      जब शब्द बुद्धि को छूते हैं तो ऐसा आभास
होता है जैसे हमें सब पता है । तुम भले एक ही वाक्य
जानते हो, यदि बुद्धि से जानते हो, तो दस वाक्य कहोगे ।
पर जब शब्द दिल को छूते हैं तो एक विस्मय होता है, कुछ
प्रस्फुटित होता है, एक लहर या फव्वारा उठता है, और तब शब्दों
की आवश्यकता नहीं रहती ।

 

31-         सच्चा प्रेम पाने की क्षमता प्रेम देने की
क्षमता के साथ ही आती है । प्रेम कोई भावना नहीं है।
प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व है ।

 

32-     सामान्यतः विजय दशमी अच्छाई की बुराई
पर जीत जानकार मनाई जाती है,   पर वास्तव में युद्ध
अच्छाई और बुराई के बीच नहीं है । वेदांत की दृष्टि से जीत
वास्तविक अद्वैत की मिथ्या द्वैत पर होती है । हालाँकि जीव जगत
ब्रह्माण्ड का ही भाग है, पर उसमें भिन्नता की कल्पना इस द्वंद्व का
कारण है । एक ज्ञानी के लिए संपूर्ण सृष्टि सजीव हो उठती है और वह बच्चों
की भांति सब कुछ जीवित देखता है ।

 

33-        सबसे बड़ी आहुति तुम स्वयं हो ।
आखिरकार, तुम दुखी क्यों होते हो?    मुख्य रूप
से तभी जब तुम जीवन में कुछ पा न सको । ऐसे समय
में सब कुछ सर्वज्ञ ईश्वर को समर्पित कर दो । ईश्वर को समर्पण
करने में सबसे बड़ी शक्ति है । जैसे एक बूँद समुद्र में घुल कर उसे
अपना लेती है, यदि वह अलग रहती है तो मिट जाएगी| पर जब वह
समुद्र बन जाती है तो अमर हो जाती है ।

 

34-        असंभव का स्वप्न देखो, असंभव
कल्पना करो| यह जान लो कि तुम इस दुनिया
में कुछ अद्भुत और अद्वितीय करने आये हो । खुद
को बड़ा सोचने की और बड़े सपने देखने की मुक्ति दो ।

 

35-          प्रेम अनुभव करना दिल का काम है और

संदेह करना दिमाग का । दोनों का अपना अपना स्थान है ।

तुम्हें दोनों की आवश्यकता है । तुम कितना संदेह कर सकते हो?

करते रहो और जब सारे संदेह ख़त्म हो जायें और नए उत्पन्न न हों,

तब वहां से श्रद्धा का आरम्भ होता है ।

 
 36-       पहला कदम है विश्राम करना और

आखरी कदम भी विश्राम करना ही है! सबसे आरामदेह

और सुखदाई स्थान तुम्हारे भीतर ही है| अपने आत्म की शांत

निर्मल गहराई में विश्राम करो – यह अति अमूल्य है । । संपूर्ण ब्रह्माण्ड

के इस अति सुन्दर, अति सुखदाई घर में स्वयं को दर्ज कर लो ।
37-प्र: मुझे नास्तिक होना चाहिए या आस्तिक?
                तुम स्वयं का वर्गीकरण क्यों करना चाहते हो?

एक दिन नास्तिक हो जाओ, किसी और दिन आस्तिक हो जाओ ।

तुम कुछ भी रहो, अन्दर से सच्चे रहो ।

 
 38-          ज़रा उन लोगों की ओर देखो जो

वह सब करते हैं जिससे तुम्हें द्वेष है । एक क्षण के लिए,

वे जैसे भी हैं उनके प्रति दया भाव रखो । तुम्हारे भीतर एक परिवर्तन

होता है; तुम विशाल हो जाते हो; तुम्हारे आत्म का विस्तार होता है ।

Hello world!


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