आत्मोन्नति की नीव


1-दुख का कारण अज्ञानता है

                   हमारे दुख का कारण
हमारी अज्ञानता है । हमने अपने इस
शरीर को शरीर   मानकर  दुख को  पाल
रखा है,कि मैं शरीर हूं,यह धारणॉ सिर्फ  एक
भ्रम मात्र है । यही भ्रम हमें दुखी यी सुखी करता है ।
तभी तो हम शीत,उष्ण,सुख,दुख आदि का अनुभव करते
हैं । इसलिए हमें इस भ्रम से उबरना होगा। यह प्रमाणित हो
चुका है कि मन की इस विशोष अवस्था में देह का बोध  बिलकुल
नहीं रह जाता है ,उस स्थिति में मनुष्य किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव
नहीं करता,लेकिन मन की यह उवस्था कभी-कभी दिखती है, यब उच्च अवस्था
अनानक एक क्षण में जैसे आंधी की तरह आती है और दूसरे ही क्षण  चली  जाती  है।
इसलिए योग के द्वारा हम इसे प्राप्त कर सकते हैं।और सदैव अपनी आत्मा को शरीर से
पृथक रख कर इस बाहरी दुख की दुनियॉ से हटकर सुख शॉति  की  भीतरी  दुनियॉ, जोकि
आत्मा की असली दुनियॉ है, में रह सकते हैं।

2-आत्मा और प्रकृति का संयोग

              जब हमारी आत्मा प्रकृति (परमात्मा)के
साथ आमेल हो जाती है तो दोनों की शक्तियों का  जो
प्रकाश होता है इससे हमें यह जगत विभिन्न रूपों में दिखाई
देता है । लेकिन अज्ञानता के कारण यह संयोग नहीं हो पाता है ।
क्योंकि हम स्वयं को शरीर मान बैठते हैं,जिससे परमात्मा से संसोग
नहीं हो पाता है।अगर मुक्षे यह ज्ञान हो जाय कि मैं शरीर नहीं हूं बल्कि
मैं सिर्फ आत्मा हूं,जो अजर अमर है,तो मुक्षे ठण्ड गरमी या अन्य किसी बात
का ख्याल नहीं रहता । लेकिन  ऐसा  भी  नहीं कि मेरा  शरीर  मुक्षसे  अलग  है,
क्योंकि जब यह शरीर है तभी मैं भी हूं।लेकिन इस शरीर में मेरा स्तित्व अलग है
,जिसे आत्मा कहते हैं ।और उसी को ” मैं ” कहा गया है,इसीसे यह शरीर कार्य करता
है। यह शरीर तो इस पृथ्वी के जड तत्वों से बना है, जोकि कल नष्ट हो जायेगा, जबकि
आत्मा उस परमात्मा से प्राप्त है,जो नष्ट नहीं होता है । इसलिए अगर मैं (आत्मा) योग
द्वारा इस शरीर से पृथक रूप में अनुभव करूं, तो जब चाहूं अपने जन्मदाता परमात्मा
से मिल सकता हूं । फिर उसके समान प्रकाशमय बन सकता हूं । जब यह ज्ञान हो जाय
कि आत्मा इस पृथ्वी के तत्वों से पूर्णतः स्वतंत्र है तो फिर यह पृथ्वी किसी भी प्रकार
से उसे प्रलोभित नहीं कर सकती है । जो लोग मुक्त हो गये हैं,उनके लिए यह पृथ्वी
उड जाती है ।

3-आत्मा और प्रकृति का स्वरूप

                  अगर देखें तो हर प्रकार के पदार्थ
चाहे क्षुद्र हो या बुद्धि सभी प्रकृति के  अन्तर्गत है
,लेकिन आत्माएं इस प्रकृति से से बाहर  हैं,  इनका
अपना कोई कोई गुण नहीं है । लेकिन फिर भी आत्मा
क्यों सुखी या दुखी होती है ?इसका कारण है -बुद्धि से
प्रतिबिम्बित होकर उसी प्रकार प्रतीयमान होती है जैसे
स्फटिक के टुकडे के पास एक लाल फूल  रखने  पर  वह
स्फटिक लाल दिखाई देता है ,उसी प्रकार हम जो सुख या
दुख अनुभव करते हैं,वह वास्तव में प्रतिबिम्बित मात्र है।
जबकि आत्मा में यह कुछ भी नहीं है । आत्मा तो प्रकृति से
पूर्णतः अलग है ।

4- आने वाले दुख को त्याग दें

                     अगर कर्मों के   सम्बन्ध  में देखें
तो कर्म का कुछ अंश हम पहले  भोग  चुके हैं, और
कुछ अंश वर्तमान में भोग रहे हैं, और  शेष  अंश  भविष्य
में भोगेंगे । हमने जिसका भोग कर लिया है,वह तो अब समाप्त
हो चुका है । जिसका भोग हम वर्तमान में कर रहे हैं, उ सका भोग
तो हमें करना ही होगा । लेकिन जो कर्म भविष्य में फल  देने के  लिए
बचा है,उसी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात उसका नाश कर सकते
हैं । इसके लिए हमें पूरी शक्ति लगानी होगी, जिसने कि अभी तक कोई फल
पैदा नहीं किया है । अपने संस्कारों पर विजय प्राप्त करने के लिए उन्हैं अनेक
कारणों में परिवर्तित करना करना होगा ।

5-विवेक शक्ति की अन्तर्दृष्टि

                           जिनमें विवेकशक्ति है और थोडी
सी भी अन्तर्दृष्टि है तो वे सुख-दुख देने वाली वस्तुओं
के अन्तस्तल को देख लेते हैं, और जान लेते हैं कि ये सुख
और दुख आपस में मानो गुंथे हुये हैं,ये एक दूसरे में परिणित हो
जाते है और इनसे संसार में कोई भी अछूता नहीं रहता है ।ये सबके
पास आते हैं। मनुष्य सारा जीवन मृगजाल के पीछे दौडता रहता है और
कभी भी अपनी वासनाओं को पूर्ण नहीं कर पाता है ।  हमारे  जीवन  में
आश्चर्य की बात तो यह है कि हम प्रतिक्षण प्राणियों को मरते हुये देखते हैं,
लेकिन फिर भी हम सोचते हैं कि हम कभी नहीं मरेंगे । चारों ओर  मूर्खों से
घिरे रहकर हम सोचते हैं कि हम ही एक मात्र पण्डित हैं ।  हम  सोचते हैं  कि
हमारा प्यार ही एकमात्र स्थाई प्यार है । हम यह भी देखते  हैं  कि  दोस्तों  का
प्रेम,सन्तान का प्रेम,यहॉ तक पति-पत्नी का प्रेम भी धीरे-धीरे नष्ट होता जाता
है । लेकिन नष्ट ही इस संसार का धर्म है,यह किसी भी वस्तु से अछूता नहीं रहता
है ।जब मनुष्य संसार की सभी वासनाओं में, यहॉ तक कि प्रेम में भी निराश हो जाता
है,तब क्षणभर के लिए यह भाव उत्पन्न हो जाता है कि यह  संसार भी  कैसा  भ्रम  है,
कैसा स्वप्न के समान है! तभी से एक  किरण  वैराग्य  की  उसके  ह्दय में  फैलती  है,
वह जगदीश सत्ता की एक झलक पाता है । इस संसार के सुख में आसक्त रहते हुये यह
कभी सम्भव नहीं होता । आजतक कोई भी महात्मा न हुआ हो जिसने अपनी महानता को
प्राप्त करने के लिए अपनी इन्द्रिय सुख और भोग को न त्यना पडा हो । दुखः का कारण है
प्रकृति की विभिन्न शक्तियों का आपस में विरोध होना। प्रत्येक अपनी-अपनी ओर खींचते हैं,
और इस प्रकार स्थाई सुख असम्भव हो जाता है।

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