आधार


1-       जिस प्रकार पतंगा प्रकाश को
देखकर अपने आप ही अग्नि में गिरता है,
उसी प्रकार भक्त भी भगवान के निमित्त अपना
सर्वस्व त्याग देता है ।

2-                जिस प्रकार दाद को जितना ही अधिक
खुजलाते जाते हैं वह उतना ही अच्छा लगता है, उसी प्रकार
भक्त भी भगवान के नाम लेने और स्तुति करने से तृप्त नहीं होते ।

3-        एक मनुष्य दूसरे को प्यार करता है,परन्तु वह दूसरा उस प्रथम मनुष्य
को प्यार नहीं करता है,इसप्रकार एक ओर के प्रेम को एकॉगी प्रेम, भक्ति कहते हैं ।
जैसे पतंगा तो दीप को चाहता है मगर दीप पतंग को नहीं चाहता है ।

4-              रात्रि के ,समय आकाश में असंख्य तारे दिखते हैं,
लेकिन सूर्योदय होने पर वे दृष्टिगोचर नहीं होते हैं ,क्या इससे कोई
कह सकता है कि आकाश में तारे नहीं हैं ? इसी प्रकार अविद्या रहते यदि
ईश्वर के दर्शन न हों तो क्या कोई कह सकता है कि ईश्वर है ही नहीं ?

5-            जिस प्रकार छत के ऊपर जाने तके लिए सीढी,
बॉस,रस्सी,इत्यादि अनेक साधन हैं, वैसे ही उस ईश्वर के पास
जाने के लिए बहुत से मार्ग हैं,पर प्रत्येक मार्ग अंत में एक होकर ईश्वर
को मिलता है ।

6-          जिस प्रकार अग्नि का कोई रूप नहीं है
परन्तु प्रज्वलित अंगारों से उसका एक प्रकार का रूप
दिखाई देता है, अर्थात उस समय अग्नि रूप धारण कर लेती
है ।उसी प्रकार परमेश्वर का कोई रूप नहीं है,पर वे कभी-कभी विशेष
आकार धारण कर लेते हैं ।

7-                   समुद्र में एक बार डुबकी मारने से यदि
रत्न न मिले तो उस समुद्र को रत्न हीन न कहो।    बार-बार
डुबकी लगाते-लगाते रत्न अवश्य मिलेगा । थोडी सी साधना करके
ईश्वर को न पाकर यह मत बोलो कि ईश्वर नहीं मिला और न ही निराश
होना, धीरज रखकर साधन करते रहें फल मिलने का समय अवश्य आयेगा ।
 8-          जिस प्रकार मेघ से सूर्य ढक जाता है,वैसे ही माया से ईश्वर ढंके हुये हैं । फिर
जैसे मेघ के हटने पर सूर्य दिखाई देता है,वैसे ही माया के हटने पर ईश्वर पर दृष्टि पडेगी ।
 9-      भॉग-भॉग कहकर चिल्लाने से क्या भॉग का नशा चढेगा ? कदापि नहीं । हॉ, यदि भॉग
पीसकर पियो तो नशा होगा । उसी प्रकार खाली ईश्वर -ईश्वर कहकर चिल्लाने से क्या मिलेगा ?
नियम बॉधकर साधन करो तो परमात्मा प्राप्त होगा ।

 

10-                   अमृत के तालाब में चाहे जैसा गिरो,
अमर हो जाओगे,वैसे ही भगवान का नाम चाहे जैसे लो,
उसका फल अवश्य मिलेगा ।

 

11-                  दीपक का कार्य तो प्रकाश देना है ।
अब उसका प्रयोग भात पकाने में करे या जालसाजी के
लिए करें,या गीता को पढने में करे, इससे दीपक का कोई
दोष नहीं है । इसी प्रकार अगर कोई भगवान का नाम को लेकर
मुक्ति चाहता है या चोरी ठगी करता है तो उसमें भगवान का क्या होष है ?

 

12-     प्र-क्या सब मनुष्य ईश्वर दर्शन कर पायेंगे ?
उ-             हॉ जैसा कोई मनुष्य कभी भूखा नहीं रहता है,कोई
नौ बजे,कोई दो बजे और कोई सॉझ को भोजन पाता है,उसी प्रकार
किसी न किसी जन्म में कभी न कभी सभी ईश्वर का दर्शन पायेंगे ।

 

13-           जिस प्रकार मछली चाहे कितनी ही दूर क्यों न
हो पर चारा देखकर वह झट से पास चली आती है, उसी प्रकार
भगवान भी विश्वासी भक्त के मन में शीघ्र आकर उपस्थित होते हैं ।
 14-   जब तक ईश्वर नहीं दिखाई देता है तब तक कामनारूप पवन से
हिलोरे लेती रहती है तबतक ईश्वर नहीं दिखाई देता है, लेकिन जब ईश्वर
की ज्योति झलकती है,तब उसकी झॉकी पाने वाले का ह्दय सुस्थिर हो जाता है ।

 

15-    मन में भगवान के आगमन की पहचान है -जैसे सूर्योदय के पूर्व गगन में ललाई
छा जाती है उसी प्रकार भगवान भी विश्वासी भक्त के मन में शीघ्र आकार उपस्थित होते हैं ।

 

16-           जिस प्रकार दूध में जल डालने पर दूध
और जल दोनों मिलकर एक हो जाते हैं ,लेकिन जब दूध
का मक्खन बन जाता है वह जल में नहीं घुलता है,इसी प्रकार
ईश्वर की प्राप्ति होने पर भक्त जन किसी दशा में भवबन्धन में नहीं पडते ।।

 

17-            सभी जल में नारायण है मगर सब जल
को पिया नहीं जाता । इसी प्रकार नारायण सर्वत्र है,पर हमें
सभी स्थानों पर नहीं जाना चाहिए ।जैसे एक जल से पॉव धोते हैं,
एक से नहाते हैं,एक को पीते हैं और एक को छूते भी नहीं हैं । ऐसे ही
भिन्न-भिन्न प्रकार के स्थान भी हैं । किसी स्थान में हम जा सकते हैं,और
किसी को दूर से ही प्रणॉम करके जाना होता है ।।

 

18-         जैसे कमल के पत्ते जल में लगे रहते हैं
पर जल से अलग रहते हैं और मछली कीचड में रहती है
लेकिन उसकी देह में कीचड नहीं लगता है । इसी प्रकार भक्त
कहीं भी रहे उसकी आस्था उसी ईश्वर में होती है ।

 

19-         पूजा तबतक करनी चाहिए जबतक हरिनाम
में प्रेम के आंसू न बहे । कान में भगवान का नाम सुनते ही
जिसकी आंखों में आंसू निकल आता है,उस मनुष्य को फिर पूजा
करने की आवश्यकता नहीं है ।

 

20-             जो व्यक्ति अपने में ईश्वर को
पहचान सके वह अन्य में भी ईश्वर देख सकता है ।

 

21-           एक के आगे लगातार शून्य लगाते जाने
से संख्या बढती है ,परन्तु एक को मिटा देने से फिर कुछ
भी शेष नहीं रहता है ,उसी प्रकार जब एक ईश्वर है तभी तक
जीवों का स्तिचत्व है ,उस ईश्वर को छोड देने से सर्वस्व मिथ्या
हो जाता है ।

 

22-              अपना दिल सुरक्षित स्थान पर रखो;
वह बहुत कोमल है । घटनाएँ और छोटी छोटी बातें उसपर
बड़ा प्रभाव छोड़ जाती हैं । अपने दिल को सुरक्षित और मन को
स्वस्थ रखने का ईश्वर से श्रेष्ठ स्थान कोई नहीं है ।

 

23-दुनिया के सभी लोग एक ही भाषा में मुस्कुराते हैं ।

 

24–           जब तक तुम असंतुष्टता से कृतज्ञता तक
नहीं जाते, जब तक स्वयं को भाग्यशाली नहीं मानने लगते,
तब तक दुर्भाग्य के बीज उपस्थित रहेंगे । “धन में मेरा भाग्य
ठीक नहीं है| संबंधों में मेरा भाग्य ख़राब है । काम में किस्मत साथ
नहीं देती ।” यह सब अपने मन से निकाल दो ।

 

25-        भगवती देवी जो शुद्ध चेतना हैं,
सभी नामों और रूपों में व्याप्त हैं । उस एक
दिव्यता को पहचानना नवरात्री का अभिप्राय है ।

 

26–             कोई और तुम्हारे लिए फूल लाए,
इसकी प्रतीक्षा न करो । अपना बागीचा खुद लगाओ
और अपनी आत्मा का श्रृंगार करो ।

 

27-     उलझन का अर्थ है कि तुमने एक रास्ता
चुना पर दूसरे रास्ते पर अधिक आनंद दीखता है ।
तुम कोई भी चुनो, लगता है दूसरा अधिक आनंदमय
होगा । आनंद किसी और से अधिक नहीं होगा । तुम स्वयं
ही आनंद के स्रोत हो ।

 

28-        शांति तुम्हारा स्वभाव है, फिर भी तुम अशांत हो।
मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम बंधन में हो ।      प्रसन्नता
तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम किसी न किसी कारण दुखी हो जाते हो।
संतोष तुम्हारा स्वभाव है फिर भी तुम कामनाओं से घिरे हो । उपकार तुम्हारा
स्वभाव है फिर भी तुम दूसरों के प्रति कदम नहीं बढ़ाते ।

 

29-               साधना का अर्थ है अपने
स्वभाव की ओर जाना, अपने स्वरूप में आना ।

 

30-      जब शब्द बुद्धि को छूते हैं तो ऐसा आभास
होता है जैसे हमें सब पता है । तुम भले एक ही वाक्य
जानते हो, यदि बुद्धि से जानते हो, तो दस वाक्य कहोगे ।
पर जब शब्द दिल को छूते हैं तो एक विस्मय होता है, कुछ
प्रस्फुटित होता है, एक लहर या फव्वारा उठता है, और तब शब्दों
की आवश्यकता नहीं रहती ।

 

31-         सच्चा प्रेम पाने की क्षमता प्रेम देने की
क्षमता के साथ ही आती है । प्रेम कोई भावना नहीं है।
प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व है ।

 

32-     सामान्यतः विजय दशमी अच्छाई की बुराई
पर जीत जानकार मनाई जाती है,   पर वास्तव में युद्ध
अच्छाई और बुराई के बीच नहीं है । वेदांत की दृष्टि से जीत
वास्तविक अद्वैत की मिथ्या द्वैत पर होती है । हालाँकि जीव जगत
ब्रह्माण्ड का ही भाग है, पर उसमें भिन्नता की कल्पना इस द्वंद्व का
कारण है । एक ज्ञानी के लिए संपूर्ण सृष्टि सजीव हो उठती है और वह बच्चों
की भांति सब कुछ जीवित देखता है ।

 

33-        सबसे बड़ी आहुति तुम स्वयं हो ।
आखिरकार, तुम दुखी क्यों होते हो?    मुख्य रूप
से तभी जब तुम जीवन में कुछ पा न सको । ऐसे समय
में सब कुछ सर्वज्ञ ईश्वर को समर्पित कर दो । ईश्वर को समर्पण
करने में सबसे बड़ी शक्ति है । जैसे एक बूँद समुद्र में घुल कर उसे
अपना लेती है, यदि वह अलग रहती है तो मिट जाएगी| पर जब वह
समुद्र बन जाती है तो अमर हो जाती है ।

 

34-        असंभव का स्वप्न देखो, असंभव
कल्पना करो| यह जान लो कि तुम इस दुनिया
में कुछ अद्भुत और अद्वितीय करने आये हो । खुद
को बड़ा सोचने की और बड़े सपने देखने की मुक्ति दो ।

 

35-          प्रेम अनुभव करना दिल का काम है और

संदेह करना दिमाग का । दोनों का अपना अपना स्थान है ।

तुम्हें दोनों की आवश्यकता है । तुम कितना संदेह कर सकते हो?

करते रहो और जब सारे संदेह ख़त्म हो जायें और नए उत्पन्न न हों,

तब वहां से श्रद्धा का आरम्भ होता है ।

 
 36-       पहला कदम है विश्राम करना और

आखरी कदम भी विश्राम करना ही है! सबसे आरामदेह

और सुखदाई स्थान तुम्हारे भीतर ही है| अपने आत्म की शांत

निर्मल गहराई में विश्राम करो – यह अति अमूल्य है । । संपूर्ण ब्रह्माण्ड

के इस अति सुन्दर, अति सुखदाई घर में स्वयं को दर्ज कर लो ।
37-प्र: मुझे नास्तिक होना चाहिए या आस्तिक?
                तुम स्वयं का वर्गीकरण क्यों करना चाहते हो?

एक दिन नास्तिक हो जाओ, किसी और दिन आस्तिक हो जाओ ।

तुम कुछ भी रहो, अन्दर से सच्चे रहो ।

 
 38-          ज़रा उन लोगों की ओर देखो जो

वह सब करते हैं जिससे तुम्हें द्वेष है । एक क्षण के लिए,

वे जैसे भी हैं उनके प्रति दया भाव रखो । तुम्हारे भीतर एक परिवर्तन

होता है; तुम विशाल हो जाते हो; तुम्हारे आत्म का विस्तार होता है ।

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